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premguru
26-06-2009, 08:26 PM
दो नम्बर का बदमाश

लेखक - प्रेमगुरु

"ये जितनी भी चूतें, गाँड, और लंड हैं सब कामदेव के हाथों की कठपुतलियाँ हैं। कौन सी चूत और गाँड किस लंड से, कब, कहाँ, कैसे और कितनी देर चुदेगी कोई नहीं जानता।"
-इसी कहानी से

Part-I
बचपन में जब भी ज़ोरों की बारिश होती या ज़ोर की बिजली कड़कती थी तो मैं डर के मारे घर में दुबक जाया करता था। पर उस रात की बारिश ने मुझे रोमांच से लबालब भर दिया था। आज भी जब ज़ोरों की बारिश होती है और बिजली कड़कती है तो मुझे एक शेर याद आ जाता है:
ऐ ख़ुदा इतना ना बरस कि वो आ ना पाएँ !
आने के बाद इतना बरस कि वो जा ना पाएँ !!
जून महीने के आख़िरी दिन चल रहे थे। मधु (मेरी पत्नी-मुधर) गर्मियों कीछुट्टियों में अपने मायके गई हुई थी। मैं अकेला ड्राईंग रूम मे खिड़की के पास बैठामिक्की के बारे में ही सोच रहा था। (मिक्की मेरे साले की लड़की थी) पिछले साल वहएक सड़क-दुर्घटना का शिकार हो गई थी और हमें रोता-बिलखता छोड़ कर चली गई थी। सचपूछो तो पिछले एक-डेढ़ साल में कोई भी दिन ऐसा न बीता होगा कि मैंने मिक्की को यादनहीं किया हो। वो तो मेरा जैसे सब कुछ लूट कर ही ले गई थी। मैं उसकी वही पैन्टी औररेशमी रुमाल हाथों में लिए बैठा उसकी याद में आँसू बहा रहा था। हर आहट पर मैं चौंकसा जाता और लगता कि जैसे मिक्की ही आ गई है।
दरवाजे परजब कोई भी आहट सी होती है तो लगता है कि तुम आई हो
तारों भरी रातमें जब कोई जुगनू चमकता है लगता है तुम आई हो
उमस भरी गर्मी में जब पुरवा का झोंका आता है तो लगता है तुमआई हो
दूर कहीं अमराई में जब कोई कोयल कूकती है लगता है कि तुम आई हो !!
उस दिन रविवार था। सारे दिन घर पर ही रहा। पहले दिन जो बाज़ार से ब्लू-फिल्मोंकी ४-५ सीडी लाया था उन्हें कम्प्यूटर में कॉपी किया था। एक-दो फ़िल्में देखी भी, पर मिक्की की याद आते ही मैंने कम्प्यूटर बन्द कर दिया। दिन में गर्मी इतनी ज्यादा किआग ही बरस रही थी। रात के कोई १० बजे होंगे। अचानक मौसम बदला और ज़ोरों की आँधी केसाथ हल्की बारिश शुरु हो गई। हवा के एक ठंडे झोंके ने मुझे जैसे सहला सा दिया। अचानक कॉलबेल बजी और लगभग दरवाज़ा पीटते हुए कोई बोला, "दीदीऽऽऽ !! ... जीजूऽऽऽ.. !! दरवाज़ा जल्दी खोलो... दीदी...!!" किसी लड़की की आवाज थी।
मिक्की जैसी आवाज़ सुनकर मैं जैसे अपने खयालों से जागा। इस समय कौन आ सकता है? मैंने रुमाल और पैन्टी अपनी जेब में डाली और जैसे ही दरवाज़े की ओर बढ़ा, एक झटकेके साथ दरवाज़ा खुला और कोई मुझ से ज़ोर से टकराया। शायद चिटकनी खुली ही रह गई थी, दरवाज़ा पीटने और ज़ोर लगाने के कारण अपने-आप खुल गया और हड़बड़ाहट में वो मुझसेटकरा गई। अगर मैंने उसे बाँहों में नहीं थाम लिया होता तो निश्चित ही नीचे गिरपड़ती। इस आपा-धापी में उसके कंधे से लटका बैग (लैपटॉप वाला) नीचे ही गिर गया। वोचीखती हुई मुझसे ज़ोर से लिपट सी गई। उसके बदन से आती पसीने, बारिश और जवान जिस्मकी खुशबू से मेरा तन-मन सब सराबोर होता चला गया। उसके छोटे-छोटे उरोज मेरे सीने सेसटे हुए थे। वो रोए जा रही थी। मैं हक्का-बक्का रह गया, कुछ समझ ही नहीं पाया।
कोई २-३ मिनटों के बाद मेरे मुँह से निकला "क्क..कौन... अरे.. नन्न्नन.. नि..निशा तू...??? क्या बात है... अरे क्या हुआ... तुम इतनी डरी हुई क्यों हो?" ओह येतो मधु की कज़िन निशा थी। कभी-कभार अपने नौकरी के सिलसिले में यहाँ आया करती थी, औररात को यहाँ ठहर जाती थी। पहले मैंने इस चिड़िया पर ध्यान ही नहीं दिया था।
आप ज़रूर सोच रहे होंगे कि इतनी मस्त-हसीन लौण्डिया की ओर मेरा ध्यान पहले क्योंनहीं गया। इसके दो कारण थे। एक तो वो सर्दियों में एक-दो बार जब आई थी तो वह कपड़ोंसे लदी-फदी थी, दूसरे उसकी आँखें पर मोटा सा चश्मा। आज तो वह कमाल की लग रही थी।उसने कॉन्टैक्ट लेंस लगवा लिए थे। कंधों के ऊपर तक बाल कटे हुए थे। कानों में सोनेकी पतली बालियाँ। जीन्स पैन्ट में कसे नितम्ब और खुले टॉप से झलकते कंधारी अनार तोक़हर ही ढा रहे थे। साली अपने-आप को झाँसी की शेरनी कहती है पर लगती है नैनीताल याअल्मोड़ा की पहाड़ी बिल्ली।
ओह... सॉरी जीजू... मधु दीदी कहाँ हैं?... दीदी... दीदी..." निशा मुझ से परेहटते हुए इधर-उधर देखते हुए बोली।
"ओह दीदी को छोड़ो, पहले यह बताओ तुम इतनी रात गए बारिश में डरी हुई... क्या बातहै??"
"वो... वो एक कुत्ता..."
"हाँ-हाँ, क्या हुआ ? तुम ठीक हो ?"
निशा अभी भी डरी हुई खड़ी थी। उसके मुँह से कुछ नहीं निकल रहा था। मैंने दरवाज़ाबन्द किया और उसका हाथ पकड़ कर सोफ़े पर बिठाया, फिर पूछा, "क्या बात है, तुम रोक्यों रही थीं?"
जब उसकी साँसें कुछ सामान्य हुई तो वह बोली, "दरअसल सारी मुसीबत आज ही आनी थी।पहले तो प्रेज़ेन्टेशन में ही देर हो गई थी, और फिर खाना खाने के चक्कर में ९ बजगए। कार भी आज ही ख़राब होनी थी। बस-स्टैण्ड गई तो आगरा की बस भी छूट गई।" शायद इनदिनों उसकी पोस्टिंग आगरा में थी।
मैं इतना तो जानता था कि वह किसी दवा बनाने वाली कम्पनी में काम करती है औरमार्केटिंग के सिलसिले में कई जगह आती-जाती रहती है। पर इस तरह डरे हुए, रोते हुएहड़बड़ा कर आने का कारण मेरी समझ में नहीं आया। मैंने सवालिया निगाहों से उसे देखातो उसने बताया।
"दरअसल महाराजा होटल में हमारी कम्पनी का एक प्रेज़ेन्टेशन था। सारे मेडिकलरिप्रेज़ेन्टेटिव आए हुए थे। हमारे दो नये उत्पाद भी लाँच किए गए थे। कॉन्फ्रेन्स ९बजे खत्म हुई और खाना खाने के चक्कर में देर हो गई। वापस घर जाने का साधन नहीं था। यहाँ आते समय रास्ते में ऑटो ख़राब हो गई। इस बारिश को भी आज ही आना था। रास्ते मेंआपके घर के सामने कुत्ता सोया था। बे-खयाली में मेरा पैर उसके ऊपर पड़ गया और वहइतनी ज़ोर से भौंका कि मैं डर ही गई।" एक साँस में निशा ने सब बता दिया।
"अरे कहीं काट तो नहीं लिया ?"
"नहीं काटा तो नहीं...! दीदी दिखाई नहीं दे रही ?"
"ओह... मधु तो जयपुर गई हुई है, पिछले १० दिनों से !"
"तभी उनका मोबाईल नहीं मिल रहा था।"
"तो मुझे ही कर लिया होता ?"
"मेरे पास आपका नम्बर नहीं था।"
"हाँ भई, आप हमारा नम्बर क्यों रखेंगी... हम आपके हैं ही कौन ?"
"आप ऐसा क्यों कहते हैं ?"
"भई तुम तो दीदी के लिए ही आती हो हमें कौन पूछता है ?"
"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।"
"इसका मतलब तुम मेरे लिए भी आती हो ?" मैं भला मज़ाक का ऐसा सुनहरा अवसर कैसेछोड़ता। वो शरमा गई। उसने अपनी निगाहें नीची कर लीं। थोड़ी देर कुछ सोचती रही, फिरबोली, "ओह, दीदी तो है नहीं तो मैं किसी होटल में ही ठहर जाती हूँ"
"क्यों, यहाँ कोई दिक्क़त है ?"
"वो... वो... आप अकेले हैं और मैं... मेरा मतलब... दीदी को पता चलेगा तो क्यासोचेगी ?"
"क्यों क्या सोचेगी ? क्या तुम इससे पहले यहाँ नहीं ठहरी ?"
"हाँ पर उस समय दीदी घर थी।"
"क्या हम इतने बुरे हैं?"
"ओह.. वो बात नहीं है।"
"तो फिर क्या बात है?"
"वो.. .वो... मेरा मतलब क्या है कि एक जवान लड़की का इस तरह ग़ैर मर्द के साथरात में... अकेले?? मेरा मतलब?? वो कुछ समझ नहीं आ रहा।" उसने रोनी सी सूरत बनातेहुए कहा।
"ओह.. अब मैं समझा, तुम मुझे ग़ैर समझती हो या फिर तुम्हें अपने आप पर हीविश्वास नहीं है।"
"नहीं ऐसी बात तो नहीं है।"
"तो फिर बात यह है कि मैं एक हिंसक पशु हूँ, एक गुंडा-बदमाश, मवाली हूँ। तुमजैसी अकेली लड़की को पकड़कर खा ही जाऊँगा या कुछ उल्टा-सीधा कर बैठूँगा? क्यों है ना यही बात?"
"ओह जीजू, आप भी बात का बतंगड़ बना रहे हैं। मैं तो यह कह रही थी आपको बेकारपरेशानी होगी।"
"अरे इसमे परेशानी वाली क्या बात है?"
"फिर भी वो एकता कपूर... मेरा मतलब वो... दीदी...?" वो कुछ सोचते हुए सी बोली।
"अरे जब तुम्हें कोई समस्या नहीं है, मुझे नहीं, तो फिर जयपुर बैठी मधु को क्या समस्या हो सकती है। और फिर आस-पड़ोस वाले किसी से कोई फिक्र नहीं करते हैं। अगरअपना मन साफ़ है तो फ़िर किसी का क्या डर? क्या मैं ग़लत कह रहा हूँ?" मैंने कहा।मैं इतना बढ़िया मौक़ा और हाथ में आई मुर्गी को ऐसे ही हवा में कैसे उड़ जानेदेता।
मुझे तो लगा जैसे मिक्की ही मेरे पास सोफ़े पर बैठी है। वही नाक-नक्श, वहीरूप-रंग और कद-काठी, वही आवाज़, वही नाज़ुक सा बदन, बिल्कुल छुईमुई सी कच्ची-कलीजैसी। बस दोनों में फ़र्क इतना था कि निशा की आँखें काली हैं और मिक्की की बिल्लौरीथीं। दूसरा निशा कोई २४-२५ की होगी जबकि मिक्की १३-१४ की थी। मिक्की थोड़ी सी गदराईहुई लगती थी जबकि निशा दुबली-पतली छरहरी लगती है। कमर तो ऐसी कि दोनों मुट्ठियोंमें ही समा जाए. छोटे-छोटे रसकूप (उरोज)। होंठइतने सुर्ख लाल, मोटे-मोटे हैं तोउसके निचले होंठ मेरा मतलब है कि उसकी बुर के होंठ कैसे होंगे। मैं तो सोच कर हीरोमांचित हो उठा। मेरा पप्पू तो छलांगे ही लगाने लगा। उसके होठों के दहाने (चौड़ाई) तो २.५-३ इंच का ही होंगे। हे लिंग महादेव, अगर आज यह चिड़िया फँस गई तोमेरी तो लॉटरी ही लग जाएगी। और अगर ऐसा हो गया तो कल सोमवार को मैं ज़रूर जल और दूधतुम्हें चढ़ाऊँगा। भले ही मुझे कल छुट्टी ही क्यों ना लेनी पड़े। पक्का वादा।
"इतने में ज़ोरों की बिजली कड़की और मूसलाधार बारिश शुरु हो गई। निशा डर के मारे मेरी ओर सरक आई। मुझे एक शेर याद आ गया:
लिपट जाते हैं वो बिजली के डर से !
या इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे !!
उसके भीगे बदन की खुशबू से मैं तो मदहोश ही हुआ जा रहा था। गीले कपड़ों में उसका अंग-अंग साफ दिख़ रहा था। शायद उसने मुझे घूरते हुए देख लिया था। वो कुछ सोचतेहुए बोली, "ओह...मैं तो पूरी ही भीग गई।"
"मैं समझ गया, वो कपड़े बदलना या नहाना चाहती है, पर उसके पास कपड़े नहीं हैं, मेरे से कपड़े माँगते हुए शायद कुछ संकोच कर रही है। मैंने उससे कहा, "कोई बातनहीं, तुम नहा लो, मैं मधु की साड़ी निकाल देता हूँ।"
वो फिर सोचने लगी, "पर वो... वो... साड़ी तो मुझे बाँधनी नहीं आती। मैंने मन मेंकहा, ‘मेरी जान तुम तो बिना साड़ी-कपड़ों के ही अच्छी लगोगी। तुम्हें कपड़े कौनकमबख़्त पहनाना चाहता है’ पर मैंने कहा -
"कोई बात नहीं, कोई पैन्ट और टॉप शर्ट या नाईटी वगैरह भी है, आओ मेरे साथ।"मैंने उसकी बाँह पकड़ी और अपने बेडरूम की ओर ले जाने लगा। आहहह... उसकी नरम नाज़ुकबाँहें मखमल जैसी मुलायम चिकनी थीं। अगर बाँहें ऐसी चिकनी हैं तो फिरजाँघें कैसीहोंगी?
कपड़ों की आलमारी तो साड़ियों से लदी पड़ी थी। एक खाने में कुछ पैन्ट-शर्ट औरटॉप आदि भी थे। मैंने उनकी ओर इशारा कर दिया। निशा ने कहा,"पर मेरी कमर तो २२” कीहै, मधु दीदी की पैन्ट मुझे ढीली रहेगी"
ओह... अच्छा कोई बात नहीं, मेरे पास एक ड्रेस और है, तुम्हें पूरी आनी चाहिए, आओमेरे साथ।" मैंने आलमारी बन्द कर दी और दूसरी अलमारी की ओर ले जाकर उसे गुलाबी रंगकी एक नई बेल-बॉटम और हल्के रंग का टॉप जिस पर पीले फूल बने थे, दिखाया, साथ एकजोड़ी ब्रा और पैन्टी भी थी। ये मैंने मिक्की के पिछले जन्मदिन के लिए मधु से छुपाकर ख़रीदे थे पर उसे दे नहीं पाया था। उन्हें देखकर निशा ने कहा, "लगता है ये तो आजाएँगे।"
उसने पैन्टी उठाई और गौर से देखते हुए बोली, "ओह... दीदी भी ऐसी ही ब्रा पहनतीहैं? ये.. तो ये.. तो ओह.. ?" वो आगे कुछ नहीं बोल पाई। बे-खयाली में उसकसे मुँह सेनिकल तो गया पर उसका मतलब जान कर वो शरमा गई। इस्स्स्स्स.... मुझे तो लगा जैसे किसीने मिक्की को ही मेरे सामने खड़ा कर दिया है बस नाम का ही फ़र्क है। मिक्की की तरह शरमाने की इस जानलेवा अदा को तो मैं ज़िन्दगी भर नहीं भूल पाऊँगा।
न जाने क्या सोचकर उसने ब्रा और पैन्टी वहीं रख दी। मेरा दिल तो छलाँगें हीलगाने लगा। हे भगवान्... बिना ब्रा और पैन्टी में तो यह बिल्कुल मिक्की की तरह क़यामत ही लगेगी। मैं अपनेआप पर क़ाबू कैसे रख पाऊँगा। मुझे तो डर लगने लगा कि कहींमैं उसका बलात्कार ही ना कर बैठूँ। मेरा पप्पू तो जैसे क़ुतुबमीनार बन गया था। इतनी उत्तेजना तो आज से पहले कभी नहीं महसूस हुई थी। पप्पू तो अड़ियल टट्टू बन गया था। अचानक मेरे कानों में निशा की मीठी आवाज़ पड़ी।
"जीजू, मैं नहाने जा रही हूँ।"
"हाँ-हाँ, तौलिया और शैम्पू आदि बाथरूम में हैं" मैं तो जैसे खयालों से जागा...
निशा बाथरूम में घुस गई। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। बाहर ज़ोरों कीबारिश और मेरे अन्दर जलती आग, दोनों की रफ्तार एक जैसी ही तो थी। अचानक मेरे दिमाग़में एक खयाल दौड़ गया और होठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान। और उसके साथ ही मेरे क़दमभी बाथरूम की ओर बढ़ गए। अब आप इतने कमअक्ल तो नहीं हैं कि आप मेरी योजना ना समझेहों।
मैंने की-होल से बाथरूम के अन्दर झाँका...
निशा ने अपनी पैन्ट और शर्ट उतार दी थी। अब वो सिर्फ ब्रा पैन्टी में थी।उफ्फ... क्या मस्त हिरनी जैसी गोरी-चिट्टी नाज़ुक कमसिन कली की तरह, जैसे मिक्की हीमेरी आँखों के सामने खड़ी हो। सुराहीदार गर्दन, पतली सी कमर मानों लिम्का की बोतलको एक जोड़ा हाथ और पैर लगा दिए हों। संगमरमर सा तराशा हुआ सफाक़ बदन किसी फरिश्तेका भी ईमान डोल जाए। एक ख़ास बात: काँख (जहाँ से बाँहें शुरु होतीं हैं) और उरोजोंसे थोड़ा ऊपर का भाग ऐसे बना था जैसे कि गोरी-चिट्टी चूत ही बनी है। ऐसी लड़कियाँ वाकई नाज़ुक होतीं हैं और उनकी असली चूत भी ऐसी ही होती है। छोटी सी तिकोने आकार की माचिस की डिब्बी जितनी बड़ी। अगर आपने प्रियंका चोपड़ा या करीना कपूर को किसी फिल्ममें बिना बाँहों के ब्लाऊज़ के देखा हो तो आपको मेरी इस बात की सच्चाई का अन्दाज़ाहो जाएगा। फिर मेरा ध्यान उसकी कमर पर गया जो २२ इंच से ज्यादा तो हरगिज़ नहीं होसकती। पतली-पतली गोरी गुलाबी जाँघें। और दो इंच पट्टी वाली वही टी-आकार की पैन्टी (जो मधु की पसंदीदा है)। उनके बाहर झाँटों के छोटे-छोटे मुलायम रोयें जैसे बाल। हेभगवान, मैं तो जैसे पागल ही हो जाउँगा। मुझे तो लगने लगा कि मैं अभी बाथरूम कादरवाजा तोड़कर अन्दर घुस जाऊँगा और... और...
निशा ने बड़े नाज़-ओ-अन्दाज़ से अपनी ब्रा के हुक़ खोले और दोनों क़बूतर जैसेआज़ाद हो गए। जैसे गुलाबीरंग के दो सिन्दूरी आम रस से भरे हुए हों। चूचियों का गहरा घेरा कैरम की गोटी जितना बड़ा, बिल्कुल चुर्टलाल। घुण्डियाँ तो बस चने के दानेजितनी। सुर्ख रतनार अनार के दाने जैसे, पेन्सिल की नोक की तरह तीखे। उसने अदा सेअपने उरोजों पर हाथ फेरा और एक दाने को पकड़ कर मुँह की तरफ किया और उस पर जीभ लगादी। या अल्लाह... मुझे लगा जैसे अब क़यामत ही आ जाएगी। उसने शीशे के सामने घुम कर अपने नितम्ब देखे। जैसे दो पूनम के चाँद किसी ने बाँध दिए हों। और उनके बीच की दरारएक लम्बी खाई की तरह। पैन्टी उस दरार में घुसी हुई थी। उसने अपने नितम्बों पर एकहल्की सी चपत लगाई और फिर दोनों हाथों को कमर की ओर ले जाकर अपनी काली पैन्टी नीचेसरकानी शुरु कर दी।
मुझे लगा कि अगर मैंने अपनी निगाहें वहाँ से नहीं हटाईं तो आज ज़रूर मेरा हार्ट फेल हो जाएगा। जैसे ही पैन्टी नीचे सरकी हल्के-हल्के मक्के के भुट्टे के बालों जैसेरेशमी नरम छोटे-छोटे रोयें जैसे बाल नज़र आने लगे। उसके बाद दो भागों में बँटेमोटे-मोटे बाहरी होंठ, गुलाबी रंगत लिए हुए। चीरा तो मेरे अंदाजे के मुताबिक ३ इंचसे तो कतई ज़्यादा नहीं था। अन्दर के होंठ बादामी रंग के। लगता है साली ने अभी तकचूत (माफ़ करें बुर) से सिर्फ मूतने का ही काम लिया है। कोई अंगुलबाज़ी भी लगता हैनहीं की होगी। अन्दर के होंठ बिल्कुल चिपके हुए-आलिंगनबद्ध। और किशमिश का दाना तोबस मोती की तरह चमक रहा था। गाँड का छेद तो नज़र नहीं आयापर मेरा अंदाजा है कि वोभी भूरे रंग का ही होगा और एक चवन्नी के सिक्के से अधिक बड़ा क्या होगा! दाईं जाँघपर एक छोटा सा तिल। उफ्फ... क़यामत बरपाता हुआ। उसने शीशे में देखते हुए उन रेशमीबालों वाली बुर पर एक हाथ फेरा और हल्की सी सीटी बजाते हुए एक आँख दबा दी। मेरापप्पू तो ऐसे अकड़ गया जैसे किसी जनरल को देख सिपाही सावधान हो जाता है। मुझे तो डरलगने लगा कि कहीं ये बिना लड़े ही शहीद न हो जाए। मैंने प्यार से उसे सहलाया पर वह मेरा कहा क्यों मानने लगा।

premguru
26-06-2009, 08:28 PM
और फिर नज़ाक़त से वो हल्के-हल्के पाँव बढ़ाते हुए शावर की ओर बढ़ गई। पानी की फुहार उसके गोरे बदन पर पेट से होती हुई उसकी बुर के छोटे-छोटे बालों से होती हुईनीचे गिर रही थी, जैसे वो पेशाब कर रही हो। मैं तो मुँह बाए देखता ही रह गया।
वो गाती जा रही थी "पानी में जले मेरा गोरा बदन..." मैं सोच रहा था आज इसे ठण्डामैं कर ही दूँगा, घबराओ मत। कोई १० मिनट तक वो फव्वारे के नीचे खड़ी रही, फिर उसनेअपनी बुर को पानी से धोया। उसने अपनी उँगलियों से अपनी फाँकें धीरे से चौड़ी कींजैसे किसी तितली ने अपने पंख उठाए हों। गुलाबी रंग की नाज़ुक सी पंखुड़ियाँ। किशमिश के दाने जितनी मदन-मणि (टींट), माचिस की तीली जितना मुत्र-छेद और उसके एक इंच नीचे स्वर्ग का द्वार, छोटा सा लाल रतनार। मुझे लगा कि मैं तो गश खाकर गिर हीपड़ूँगा।
उसने शावर बन्द कर दिया और तौलिये से शरीर पोंछने लगी। जब वह अपने नितम्ब पोंछ रही थी, एक हल्की सी झलक उसकी नर्म नाज़ुक गाँड के छेद पर भी पड़ ही गई। उफ्फ...क्या क़यामत छुपा रखी थी उसने। अपनी बगलें पोंछने के लिए जब उसने अपनी बाहें उठाईंतो मैं देखकर दंग रह गया। काँख में एक भी बाल नहीं, बिल्कुल मक्खन जैसी चिकनी साफसुथरी गोरी चिट्टी। अब मैं उसे हुश्न कहूँ, बिजली कहूँ, पटाखा कहूँ याक़यामत...
अर्श मलशियानी का एक शेर तो कहे बिना नहीं रहा जा रहा:
बला है क़हर है आफ़त है फितना हैक़यामत है
इन हसीनों की जवानी को जवानी कौन कहता है?
अब उसने बिना ब्रा और पैन्टी के ही शर्ट (टॉप) और बेलबॉटम पहनना चालू कर दिया। बेलबॉटम पहनते समय मैंने एक बार फिर उसकी चूत पर नज़र डाली। लाल चुकन्दर जितनी छोटीसी, प्यारी सी चूत जैसे मिक्की का ही डबल रोल हो। अब वहाँ रुकने का कोई मतलब नहींरह गया था। हे भोले शंकर आज मेरी लाज रख लेना कल सोमवार है याद हैना???...
प्रेम आश्रम वाले गुरुजी ने अपने पिछले विशेष प्रवचन में सच ही फ़रमाया था, "येजितनी भी चूतें, गाँड, और लंड हैं सब कामदेव के हाथों की कठपुतलियाँ हैं। कौन सी चूत और गाँड किस लंड से, कब, कहाँ, कैसे और कितनी देर चुदेगी कोई नहीं जानता ।"
शायद आज मेरी भी किस्मत खुल जाए।

Part-II
मैं सोफ़े पर बैठ गया। जैसी ही बाथरूम का दरवाज़ा खुला गीले बालों से टपकती शबनम जैसी बूँदे, काँपते होंठ, क़मसिन बदन, बेल-बॉटम में कसी पतली-पतली जाँघों के बीचफँसी बुर का इतिहास और भूगोल यानी चीरा और फाँकें साफ़ महसूस हो रही थी। हे भगवान क्या फुलझड़ी है, पटाखा है, या कोई बम है। एक जादुई रोशनी से जैसे पूरा ड्राईंग-रूमही भर उठा। अचानक एक बार जोर की बिजली कड़की और एक तेज धमाके के साथ पूरे मुहल्लेकी लाईट चली गई। हॉल में घुप्प अँधेरा छा गया। उसके साथ ही डर के मार निशा की चीखसी निकल गई, "जीजू, ये क्या हुआ?" वो लगभग दौड़ती हुई फिर मेरी ओर आई। इस बार वहटकराई तो नहीं पर उसकी गरम साँसें मैं अपने पास ज़रूर महसूस कर रहा था।

"लगता है कहीं शॉर्ट-सर्किट हो गया है। तुम डरो मत, यहीं ठहरो, मैं इन्वर्टरचालू करता हूँ।" मैंने दरवाज़े के पास लगा इन्वर्टर चालू किया तो हमारे बेडरूम और स्टडी-रूम की बत्ती जल उठी।
"हे भगवान सब कुछ उल्टा-सीधा आज ही होना है क्या?" निशा रूआँसे स्वर में बोली।
"क्यों क्या हुआ?"
"अब देखो ना लाईट भी चली गई।" उसने एक ठंडी साँस ली।
"पर बेडरूम में तो लाईट है ना ?"
"पर मुझे तो कल के वर्कशॉप में प्रेज़ेन्टेशन के लिए प्रोजेक्ट-वर्क तैयार करनाथा और मेरे लैपटॉप को भी आज ही ख़राब होना था। हे भगवान..."
"कोई बात नहीं तुम स्टडी-रूम में रखे कम्प्यूटर से काम चला सकती हो।" मैंने पूछा "कितना काम है?"
"घंटा भर तो लग ही जाएगा। अच्छी मुसीबत है। मैं भी कहाँ फँस गई इस कम्पनीमें।"
"क्यों क्या हुआ?"
"अब देखो ना रोज़-रोज़ का प्रेज़ेन्टेशन, मीटिंग्स, वर्कशॉप, एनालिसिस, प्रोडक्टलाँचिंग - झमेले ही झमेले हैं इस नन्हीं सी जान पर।"

मैंने अपने मन मे कहा, 'मेरी जान हम जैसे किसी आशिक़ का दामन थाम लो, सारेप्रोजेक्ट कर दूँगा' पर मैंने कहा "कौन सा उत्पाद लाँच कर रही हो?"
"दो उत्पाद हैं, एक तो गर्भाधान रोकने की गोली है, महीने में सिर्फ एक गोली औरदूसरा बच्चों के अँगूठा चूसने और दाँतों से नाख़ून काटने की आदत से छुटकारा दिलानेकी दवाई है, जिसे नाखूनों पर लगाया जाता है।"
"हे भगवान तुम सब लोग हमारी रोज़ी-रोटी छीन लेने पर तुले हो।"
"क्या मतलब? हम तो बिज़नेस के साथ-साथ समाज सेवा भी कर रहे हैं ?" निशा नेहैरानी से पूछा वो बात-बात में 'क्या मतलब' ज़रूर बोलती है।
"अरे भई साफ़ बात है, तुम गर्भधारण रोकने की दवा की मार्केटिंग करती हो तोबच्चे कहाँ से पैदा होंगे और फिर हमारे उत्पाद जैसे बच्चों का दूध, बच्चों का आहार, बच्चों के तेल, नैप्पी, पावडर, साबुन कौन खरीदेगा?"
"और वो अँगूठा चूसने की आदत छुड़ाने की दवाई?"
"वो भी हम जैसे प्रेमियों के ऊपर उत्याचार ही है।"
"क्या... मत...लब?" निशा मेरा मुँह देखने लगी।
"शादी के बाद वो आदत अपने-आप छूट जाती है... उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती। शादी केबाद भला कौन उसे अँगूठा चूसने देता है..." मैंने हँसते हुए कहा।

पहले तो मेरी बात उसे समझ ही नहीं आई, लेकिन बाद में तो वो इतने ज़ोर से शरमाई कि पूछो मत। उसने मुझे एक धक्का सा देते हुए कहा "जीजू तुम एक नम्बर के बदमाश हो।"
"नहीं, मैं दो नम्बर का बदमाश हूँ।" मैं खिलखिला कर हँस पड़ा
"जीजू मज़ाक छोड़ो, मुझे अपना प्रोजेक्ट पूरा करना है। कम्प्यूटर कहाँ है?"
"हाँ चलो मुझे भी अपना प्रोजेक्ट बनाना है।"
"अरे… आपको कौन सा प्रोजेक्ट बनाना है?"
"अरे तुम नहीं जानती, मुझे एक नहीं पूरे ५ प्रोजेक्ट्स पर काम करना है" अब मैंउसे क्या बताता कि 'मुझे तुम्हारा दूध पीना है, बुर चाटनी है, अपना लंड चुसवाना है, चुदाई करनी है, और गाँड भी मारनी है।' हो गए ना पूरे ५ प्रोजेक्ट्स।
"ओह... पर आपके लिए तो ये मामूली सी बात है आप तो बड़े अनुभवी हैं आप तो झट से कार्यक्रम बना ही लेंगे।" वो भले मेरे इन नए उत्पादों के बारे में अभी क्या जानतीथी।
"हाँ वो तो ठीक है पर मेरे पास भी समय कम बचा है, केवल २ घंटे और पूरे ५ प्रोजेक्ट्स... ख़ैर छोड़ो पूरा तो कर ही लूँगा। मुझे अपने-आप पर पूरा भरोसा है। आओस्टडी-रूम में तुम्हें कम्प्यूटर दिखा दूँ।" और फिर हम दोनों स्टडी-रूम में आगए।

कम्प्यूटर चालू करने के बाद उसने पेन-ड्राईव निकाली और उसे कम्प्यूटर में नीचे बने छेद में डालने की कोशिश की पर वह अन्दर नहीं गया।
"जीजू ये इस छेद में अन्दर क्यों नहीं जा रहा?"
"अरे पीछे वाली छेद में डालो, उसमें आराम से चला जाएगा।" उसने मेरी ओर थोड़े गुस्से से देखा तो मैंने कहा, "अरे भई ये छेद ख़राब है, इसके पीछे और छेद हैं, उसमें... वो सही है… तुम मज़ाक समझ रही हो।" मैंने हँसते हुए कहा।
"आप मेरा लैपटॉप ठीक कर दो ना प्लीज़" मेरी बात काटते हुए निशा बोली।
"लाओ मैं देख देता हूँ, क्या समस्या है।" मैं लैपटॉप लेकर अपने बेडरूम में आ गया। बेडरूम में पहुँच कर मैंने अपने प्रोजेक्ट के ऊपर काम करना शुरु कर दिया। इसनिशा (रात) को कैसे रात की रानी बनाना है। मुझे तो उसकी चूत के साथ-साथ गाँड भीमारनी है और उसे लंड भी चुसवाना है। सबसे बड़ी बात तो उसे सेक्स के लिए तैयार करनाही मुश्किल है। समय कम और मुक़ाबला सख्त। ख़ैर मुहब्बत-ए-मर्दा, मदद-ए-ख़ुदा।

सिमरन (मेरी क्लास मेट) को चोदने में मुझे पूरे दो साल लग गए थे । अनारकली कीचुदाई में दो महीने, सुधा की चुदाई में दो हफ़्ते और मिक्की की चुदाई के प्रोग्राममें दो दिन ही लगे थे। पर निशा को चुदाई और गाँड मरवाने के लिए तैयार करने में तोमेरे पास सिर्फ दो घंटे ही हैं। आज प्रेम-गुरु का असली इम्तिहान है। पूरी तैयारीकरनी होगी ज़रा सी ग़लती पूरी परियोजना को ख़राब कर देगी और ये नई चिड़िया मेरेहाथों से निकल भागेगी। पर मैं ऐसा कदापि नहीं होने दूँगा। आख़िर मुझे प्रेम-गुरुऐसे ही तो नहीं कहते हैं।

लैपटॉप में वायरस था जिसके कारण विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम की फाइलें ख़राब हो गईंथीं। ये तो मेरे बाएँ हाथ का खेल था। पर मैं इसे अभी ठीक नहीं किया। मैंने उसके बैगकी जाँच की। उसमें दवाईयों के नमूने, कागज़, और मेकअप का छोटा-मोटा सामान था। मैंने बोरोलीन जैसी खुशबू वाली क्रीम की ट्यूब, वैसलीन की डिब्बी, एक छोटा सा शीशा और नैपकीन निकाल कर सिरहाने के नीचे रख लिए।
अब मुझे अपने परियोजना की पूरी तरह से तैयारी के बारे में सोचना था। दो तीनविकल्प भी रखने थे। सही-सही क्रियान्वयन के लिए कार्यक्रम बनाना था। मज़बूत पक्ष, कमज़ोर पक्ष, मौक़े, संभावित हानियाँ सभी को ध्यान में रखकर कार्यक्रम शुरु करनाथा। मैंने कई विकल्पों पर विचार किया और फिर सब कुछ अपने दिमाग़ में सोच कर केफ्लो-चार्ट बनाने लगा। मुझे चुदाई का यह कार्यक्रम ३ चरणों में पूरा करना था।

मैंने एक बार स्टडी-रूम की ओर जाकर देखा। निशा कम्प्यूटर पर लगी थी। कोई ४० मिनटतो बीत ही गए थे। निशा का काम भी खत्म होने ही वाला होगा। मैंने उससे पूछा कि कितना समय और लगेगा तो उसने बताया कि कोई १५-२० मिनट और लगेंगे। मैंने दराज़ में से ऑपरेटिंग सिस्टम की सीडी ली और वापिस बेडरूम में आ गया। मैंने फाईलों को फिर से डालदिया और वायरस स्कैन चालू कर दिया। उसका कम्प्यूटर काम करने लगा। इस काम में मुझे१०-१५ मिनट लगे। जब मैं सीडी वापिस रखने स्टडी रूम में गया तो निशा मेरा कम्प्यूटरबन्द ही करने जा रही थी। मैं दरवाजे के बाहर ही रूक कर अन्दर देखने लगा। उसनेस्टार्ट मेनू पर क्लिक किया। शट डाउन पर क्लिक करने की बजाय उसने रीसेन्ट डॉक्यूमेन्ट मेनू खोला। मेरी आँखें चमकने लगीं। फिर उसने ऊपर से नीचे तक फाईलों की सूची देखी। उसकी निगाहें कुछ वीडियो फाईल पर पड़ीं। उसने राईट क्लिक करके उस फाईलका स्त्रोत देखा। अगर आप थोड़ा बहुत कम्प्यूटर जानते हों तो यह सब बातें आपको पता होंगी ही। ये वही फाईलें थीं जो मैंने आज सुबह ही कम्प्यूटर पर कॉपी की थी, और २-३देखी भी थी। इस फाईल पर क्लिक करते ही फिल्म चलनी शुरु हो गई। मेरा काम हो गया था।मैं झट से उल्टे पाँव बेडरूम की ओर भागा।

आप शायद सोच रहे होंगे अब वापस आने का नहीं साली को पटक कर चोदने का समय था। आप ग़लत सोच रहे हैं। मैं कोई ज़ोर-ज़बर्दस्ती में विश्वास नहीं करता हूँ। मैं तोप्रेम का पुजारी हूँ। मैंने अब तक जितनी भी चूत या गाँड मारी है वो सभी अपने दोनोंहाथों में जैसे अपनी चूत और गाँड लेकर मेरे पास आईं हैं। मैं उसे भी इसी तरह चोदनाचाहता था। मैं उसे इतना गरम कर देना चाहता था कि वह ख़ुद चल कर मुझसे चूत और गाँड मारने को कहे, तभी तो चुदाई का असली मज़ा आता है। किसी को मजबूर करके चोदना तो बस पानी निकालनी वाली बात होती है।

मुझे पता था साली फिल्म के एक दो सीन ही देखेगी और फिर उसे बन्द करके मेरे बेडरूम में यह चेक करने आएगी कि मैं क्या कर रहाहूँ। कोई देख तो नहीं रहा। मैं भीइस मामले में पक्का खिलाड़ी हूँ। मैं उसके लैपटॉप को ठीक करने की पूरी एक्टिंग कररहा था। वो चुपके से आई और एक निगाह डालते हुए दबे पाँव वापस चली गई। हे लिंगमहादेव ! तेरा लाख-लाख धन्यवाद। काले हब्शी और गोरी फिरंगन की गाँड-चुदाई और एक ४०साल की आँटी की एक १५-१६ साल के लड़के के साथ चुदाई देखकर तो मेरी रात की रानी गुलज़ार हो जाएगी। मेरे कार्यक्रम का पहला चरण सफलता पूर्वक सम्पन्न हो गया था।

कोई २५-३० मिनट के बाद निशा बेडरूम की ओर आई। उसकी आँखों में लाल डोरे तैर रहेथे। होश उड़े हुए, चाल में लड़खड़ाहट, होंठ सूखे हुए। वो तो बस इतनी ही बोल पाई, "जीजू क्या कर रहे हो?" शायद अपनी उखड़ी साँसों पर क़ाबू पाना चाहती थी।

"बस तुम्हारा लैपटॉप ही ठीक कर रहा था। वायरस था, विंडोज़ की फाईलें ख़राब होगईं थीं। मैंने ठीक कर दिया है। तुमने इन्टरनेट से कोई ग़लत-सलत फाईल तो नहीं खोलीं थीं?" मैंने पूछा।
अब तो उसके चेहरे का रंग देखने लायक था। "ननन... नहीं तो..?"
"कोई बात नहीं पर तुम इतना घबरा क्यों रही हो?"
"वो.. वो बिजली कड़क रही है ना ?" अजीब संयोग था कि उसी समय ज़ोर से बिजली फिर कड़की थी। बाहर अब भी पानी बरस रहा था। मैं जानता था कि वो कौन सी बिजली की बात कर रही है। वो मेरे पास आकर बैठ गई।
"जीजू सोने का क्या करेंगे?" वो बोली
मैंने मन में सोचा 'मेरी जान, तुम्हें सोने कौन देगा आज की रात।' पर मैंने कहा "भई बिस्तर लगा है सो जाओ।"
"यहाँ?"
"क्यों क्या हुआ?"
"वो मेरा मतलब, हम दोनों एक कमरे में?"
"मैं बाहर सो जाता पर बिजली नहीं है और गेस्ट रूम में ज़हरीली मकड़ियाँ और मच्छर हैं। कभी-कभी जंगली बिल्ली भी आ जाती है। भई मुझे बाहर डर लगता है।"
"ओह... अजीब मुसीबत में फँस गई मैं तो दीदी को भी आज ही जाना था।"
"इसमें मुसीबत वाली कौन सी बात है? क्या मधु को जंगली बिल्लियों और मकड़ियों का डर नहीं लगता?"
"वो.. वो... ऐसी बात नहीं पर... और... वो... एक ही कमरे में एक ही बिस्तर पर...?"
"क्यों अपने आप पर विश्वास नहीं है क्या?"
"नहीं ऐसी बात नहीं है पर... वो.. वो.."
"चलो मैं नीचे फर्श पर सो जाता हूँ, भले ही मुझे नींद आए या नहीं कोई बात नहीं।"
"ओहह... नहीं मैं नीचे में सो जाऊँगी।"
मैंने मन में सोचा 'मेरी जान नीचे तो तुम्हें सोना ही पड़ेगा, पर फ़र्श पर नहीं, मेरे नीचे।' मेरी योजना बिल्कुल पक्की थी किसी चूक का सवाल ही नहीं था। मैंने उसी भोलेपन से कहा "अरे, क्यों हम भरतपुर वालों की मेहमान नवाज़ी को बट्टा लगा रही हो? अच्छा एक काम करते हैं, बीच में एक तकिया लगा देते हैं।"
वो मेरी बात पर हँस पड़ी "एक तकिये से क्या होगा?"
"तो दो लगा देते हैं।" मैंने कहा। वह कुछ सोच रही थी। उसके मन की उलझन मैं अच्छी तरह जानता था। "ओह... अभी कौन सी नींद आ रही है, चलो छोड़ो कोई और बात करो।" मैंने कहा।

हम दोनों बिस्तर पर बैठ गए। मैं बिस्तर पर टेक लगाकर बैठा था और निशा मेरे सामने बैठी थी। पैन्ट में फँसी उसकी चूत के आगे का भाग कैरम की गोटी जितनी दूर में गीला हुआ था। साली फिरंगी और आँटी की चुदाई देखकर पूरी गरम हो गई थी। उसने बात चालू की।

"जीजू इस नौकरी से पीछा छूटेगा या नहीं? नौकरी बदलने का कोई मौक़ा है या नहीं? आप तो हाथ देखकर बता देते हैं ?" निशा ने हाथ आगे बढ़ा दिया। मैंने झट से उसका हाथपकड़ लिया। निशा पहले हाथ की रेखाओं और भाग्य आदि पर विश्वास नहीं करती थी। पर जबसे मधु की संगत में आई है, थोड़ा-बहुत भाग्य और सितारों को मानने लगी है।

premguru
26-06-2009, 08:29 PM
उसका शुक्र पर्वत तो सुधा और मिक्की से भी ऊँचा था। हे भगवान आज तो तूने मेरी लॉटरी ही लगा दी। उसकी हथेली के बीच में तिल देखकर मैंने कहा "तुम्हारे हाथ में ये जो तिल है उसके हिसाब से तो तुम्हारे पास दौलत की कोई कमी नहीं है।"
"अरे जीजू आप भी मज़ाक करते हैं। कहाँ है मेरे पास दौलत ?"
"अरे भई हाथ की रेखाएँ तो यही कहतीं हैं। क्या हुस्न की दौलत कम है तुम्हारे पास ?"
"जीजू आप भी..." वो शरमा गई। अच्छा... फिर बोली "मजाक छोड़ो और ढंग की बात बताओ ना।"
"मैंने उससे पूछा कि तुम्हारी उम्र कितनी है तो उसने बताया कि वह २४ की है।
"क्यों तुम भी मधु और मेरी तरह मांगलिक हो ?"
"हाँ क्यों ?"
"अरे भई माँगलिक की शादी २४वीं साल में हो जाती है।"
"पर मैं तो अभी ५-७ साल शादी नहीं करूँगी।"
"भई मंगल तो यहीं कहता है और अगले ३ साल में तुम २ बच्चों की मम्मी भी बन जाओगी।"
"जीजू आप भी एक नम्बर के बदमाश हो। मज़ाक छोड़ो, कोई ठीक बात बताओ ना।"
"अरे इसमें क्या झूठ है।" उसने अपनी आँखें टेढ़ी कीं तो मैंने कहा, "अच्छा चलो बताओ, तुम्हारे कितने ब्वॉयफ्रेण्ड हैं ? कभी उनके साथ फिल्म देखती हो या नहीं ?"
"नहीं मेरा तो कोई ब्वॉयफ्रेण्ड नहीं है।" उसने आँखें तरेरते हुए कहा।
"अरे फिर इस जवानी और ज़िन्दगी का क्या फ़ायदा। मैं तो अब भी अपनी गर्लफ्रेण्ड को लेकर फ़िल्म देखता हूँ।" मैंने कहा।
"क्या मतलब ? क्या आप अब भी... मेरा मतलब...?"
"अरे भई मेरी गर्लफ्रेण्ड तो मधु ही है।" मैंने हँसते हुए कहा "तुम तो जानती हो मैं मधु से कितना प्यार करता हूँ। कई बार मैं और मधु फिल्म देखने जाते हैं तो ऐसी ऐक्टिंग करते हैं कि जैसे कॉलेज से भागकर के आए हों। हमें देखकर तो बड़े-बूढ़ों के दिल पर भी साँप लोटने लग जाते हैं।"
"हाँ... हाँ मुझे पता है। मधु दीदी बताती हैं तुम तो उनके पूरे 'मिट्ठू' हो। वह बताती है कि आप तो शादी के इतने सालों बाद भी उनपर लट्टू ही बने हो।" उसने मेरा मज़ाक उड़ाते हुए कहा।
"तुम कहो तो तुम्हारा भी 'मिट्ठू बन जाता हूँ।"
"मैं झाँसी की शेरनी हूँ ऐसे क़ाबू नहीं आऊँगी मिट्ठू जी ?" उसने आँखें नचाते हुए कहा। मैंने मन में सोचा 'मेरी जान आज की रात तुम जैसी मैना के मुँह से ही बुलवाऊँगी बोल मेरी मैना गंगाराम' फिर मैंने कहा "अच्छा चलो बताओ तुम्हार वज़न कितना है?"
"उण्म्म्म्म... ४८ किलो"
"मेरे हिसाब से तो २१ किलो होना चाहिए।"
"क्या मतलब?"
"अरे भई बहुत सीधी बात है दिल का २७ किलो तो हटा ही दो, फिर असली वज़न तो २१ किलो ही रहा ना ?"
"तो आप भी मानते हैं कि हम झाँसी वालों का दिल बड़ा होता है।" उसने छाती तानते हुए कहा। सचमुच उसकी घुण्डियाँ कड़ी हो रहीं थीं।
"दिल बड़ा नहीं, पत्थर का है।"
"क्या मतलब ?"
"चलो वो बाद में बताऊँगा।" मैंने बात को अपने प्रोजेक्ट की ओर मोड़ना चाहा। "देखो ये सब ज्योतिषीय गणित है। प्रकृति ने सब चीजें अपने हिसाब से बनाई हैं। सब चीजें एक सही अनुपात में होतीं हैं। उन्हें तो मानना ही पड़ेगा ना ?"
"वो कैसे ?"
"अब देखो ना भगवान ने तुम्हारी नाक तुम्हारे अँगूठे जितनी बड़ी बनाई है।" उसने हैरानी से अपनी नाक पर हाथ लगाया और मेरी ओर देखने लगी।

"विश्वास नहीं होता तो नाप कर देख लो।" मैंने पास रखा फीता उसकी ओर बढ़ा दिया। उसने अपना अँगूठा नापा जो ७ से.मी. निकला। फिर मैंने उसकी नाक पर फीता रख कर नाप लिया। इस दौरान मैं उसके गाल छूने से बाज नहीं आया। कश्मीरी सेब हों जैसे। उसकी नाक का नाप भी ७ से.मी. ही निकला। फिर मैंने कहा, तुम्हारी मध्यमा (बीच की) उँगली मापो। जब उसने नापी तो वह ९ से.मी. निकली। अब मैंने उससे कहा कि अपने कान की लम्बाई नापो। ये काम तो मुझे ही करना था। इस बार मैंने उसका दूसरा गाल भी छू लिया। क्या मस्त मुलायम चिकना स्पर्श था। साली के गाल इतने मस्त हैं तो चूचियाँ तो कमाल की होंगी। ख़ैर कान का नाप भी ९ से.मी. होना ही था।
"अरे ये तो कमाल हो गया ?" वह हैरानी से बोली तो मैंने कहा, "मैं बिना नापे तुम्हारी लम्बाई भी बता सकता हूँ।"
"वो कैसे ?"
"तुम्हारे बांह की लम्बाई का ढाई गुणा होगी।" उसने मेरी ओर हैरानी से देखा तो मैंने कहा "नाप कर देख लो।"
"मेरे कार्यक्रम का फ्लो-चार्ट बिल्कुल सही दिशा में जा रहा था। अब उसके नाज़ुक संतरों की बारी थी। चिड़िया अपने आप को बड़ा होशियार समझती थी। पर मैं भी प्रेम-गुरु ऐसी ही नहीं हूँ। मैंने फीता उठाया और ढीले टॉप के अन्दर उसकी काँख से सटा दिया। वो क्या बोलती ? चुप रही। उसकी काँख सफाचट थी। बालों का नामों-निशान नहीं। थोड़ी सी चूचियों की झलक भी मिल गई। एकदम सख़्त। घुण्डियाँ कड़क। गोरे-गोरे.. इलाहाबादी अमरूद जैसे।

बांह की लम्बाई ६३ से.मी. निकली। मैंने कहा तुम्हारी लम्बाई १५८ से.मी. यानि कि ५ फीट ३ इंच के आस-पास है।"
"ओह, वेरी गुड, क़माल है जीजू।" उसकी आँखें तो फटी ही रह गईं। वो फिर बोली "जीजू जॉब का भी बताओ ना ?" मैं उसे प्रभावित करने में सफल हो गया था।

अब कार्यक्रम के दूसरे भाग की अन्तिम लाईन लिखनी थी। मैंने कहा "एक और बात है ऊपर के होंठ और नीचे के होंठ भी बिल्कुल एक समान होते हैं।"
"नहीं ये ग़लत है नीचे के होंठ थोड़े मोटे होते हैं। मेरे होंठ ज़रा ध्यान से देखो, नीचे का मोटा है या नहीं ?" निशा अपने मुँह वाले होंठों की बात ही समझ रही थी, उसे क्या पता कि मैं तो चूत के होंठों की बात कर रहा था।
"अरे मैं मुँह के होंठों की नहीं दूसरे होठों की बात कर रहा था। अच्छा चलो बताओ औरतें ज़्यादा बातें क्यों करतीं हैं ?" मैंने पूछा।
"क्यों... ?" उसने आँखें तरेरते हुए पूछा। वो अब मेरी बात का मतलब कुछ-कुछ समझ रही थी।
"अरे भई उनके चार होंठ होते हैं ना। दो ऊपर और दो नीचे" मैंने हँसते हुए कहा।
"क्या मतलब...?" उसकी निगाह झट से अपनी चूत की ओर चली गई, वहाँ तो अब चूत-रस की बाढ़ ही आ गई थी. उसने झट से तकिया अपनी गोद में रख लिया और फिर बोली, "ओह जीजू, आख़िर तुम अपनी औक़ात पर आ ही गए... मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी। अकेली मज़बूर लड़की जानकर उसे तंग कर रहे हो। मुझे नींद आ रही है।" वो नाराज़ सी हो गई।

प्यार पाठकों और पाठिकाओं, मेरे कार्यक्रम का दूसरा चरण पूरा हो गया था. आप सोच रहे होंगे भला ये क्या बात हुई। लौण्डिया तो नाराज़ होकर सोने जा रही है ? थोड़ा सब्र कीजिए अभी मेरा तीसरा चरण पूरा कहाँ हुआ है।

मैं जानता था साली गरम हो चुकी है। उसकी चूत ने दनादन पानी छोड़ना शुरु कर दिया है और अब तो पानी रिस कर उसकी गाँड को भी तर कर रहा होगा। अब तो बस दिल्ली दो क़दम की दूर ही रह गई है। मेरा अनुभव कहता है कि इस तरह की बात के बाद लड़की इतनी ज़ोर से नाराज़ हो जाती है कि बवाल मचा देती है, पर निशा तो बस सोने की ही बात कर रही थी. मैंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा
"अरे तुम बुरा मान गई... ये मैं नहीं प्रेम-आश्रम वाले गुरुजी कहते हैं। अच्छा चलो अब सो ही जाते हैं। पर एक समस्या है ?"
"वो क्या ?"
"दरअसल मैं सोने से पहले दूध पीता हूँ।"
"ये क्या समस्या है, रसोई में जाकर पी लो।"
"वो... वो... रसोई में लाईट नहीं है ना। बिना लाईट के मुझे डर लगता है।"
"ऐसे तो बड़े शेर बनते हो।"
"तुम भी तो झाँसी की शेरनी हो, तुम ही ला दो ना।"
"मैं.. मैं... " इतने में ज़ोर की बिजली कड़की और निशा डर के मारे मेरी ख़िसक आई "मुझे भी अँधेरे से डर लगता है।"
"हे भगवान इस प्यासे को कोई मदद नहीं करना चाहता" मैंने तड़पते हुए मजनू की तरह जब दिल पर हाथ रख एक्टिंग की तो निशा की हँसी निकल गई।
"मैं क्या मदद कर सकती हूँ ?" उसने हँसते हुए पूछा
"तुम अपना ही पिला दो।"
"क्या मतलब ?" उसने झट से अपना हाथ अपने उरोजों पर रख लिए "जीजू तुम फिर...?"
इतने बड़े अमृत-कलशों में दूध भरा पड़ा है थोड़ा सा पिला दो ना तुम्हारा क्या बिगड़ जाएगा" मैंने लगभग गिड़गिड़ाने के अन्दाज़ में कहा।

तो निशा पहले तो हँस पड़ी फिर नाराज़ होकर बोली,"जीजू तुम हद पार कर रहे हो।"
"अभी पार कहाँ की है तुम कहाँ पार करने दे रही हो ?"
"जीजू मुझे नींद आ रही है" उसने आँखें तरेरते हुए कहा।

"हे भगवान क्या ज़माना आ गया है कोई किसी की मदद नहीं करना चाहता।" निशा हँसते हुए जा रही थी। मैंने अपनी एक्टिंग करनी जारी रखी "सुना है झाँसी के लोगों का दिल बहुत बड़ा होता है पर अब पता चला कि बड़ा नहीं पत्थर होता है और पत्थर ही क्या पूरा पहाड़ ही होता है, टस से मस ही नहीं होता, पिघलता ही नहीं।" निशा हँसते-हँसते दोहरी होती जा रही थी। पर मेरी ऐक्टिंग चालू थी। "हे भगवान, इन ख़ूबसूरत लड़िकयों का दिल इतना पत्थर का क्यों बनाया है, इससे अच्छा तो इन्हें काली-कलूटी ही बना देता कम से कम किसी प्यासे पर तरस तो आ जाता।" मैंने अपनी ऐक्टिंग चालू रखी।
मैं तो शोले वाला वीरू ही बना था "जब कोई दूध का प्यासा मरता है तो अगले जन्म में वो कनख़जूरा या तिलचट्टा बनता है। हे भगवान, मुझे कनख़जूरा या तिलचट्टा बनने से बचा लो। हे भगवान मुझे नहीं तो कम से कम इस झाँसी की रानी को ही बचा लो।"
"क्या मतलब ?"
"सुना है दूध के प्यासे मरते व्यक्ति की बददुआ से वो कंजूस लड़की अगले जन्म में जंगली बिल्ली बनती है। और इस जन्म में उसकी शादी २४वीं साल में ही हो जाती है और अगले ३ सालों में ६ बच्चे भी हो जाते हैं।" मैंने आँखें बन्द किए अपने दोनों हाथ ऊपर फैलाए।

हँसते-हँसते निशा का बुरा हाल था। वो बोली "३ साल में ६ बच्चे... वो कैसे ?"

मेरे कार्यक्रम की तो अब बस चंद लाईनें ही लिखनीं बाकी रह गई थीं। चिड़िया ने दाना चुगने के लिए जाल की ओर बढ़ना शुरु कर दिया था। मैंने कहा "सच्चे आशिक़ की दुआ हो और भगवान की मर्ज़ी हो तो सबकुछ हो सकता है। हर साल दो-दो जुड़वाँ बच्चे पैदा हो सकते हैं।"

निशा ठहाके मारने लगी थी। हँसते-हँसते वो दोहरी होती जा रही थी। मैंने कहा चलो दूध नहीं पिलाना, ना सही, पर कम से कम एक बार दूध-कलश देख ही लेने दो।"
"देखने से क्या होगा ?"
"मुझे तसल्ली हो जाएगी... एक झलक दिखाने से तुम्हारा क्या घिस जाएगा, प्लीज़ एक बार।"

"ओह... जीजू तुम भी ना... नहीं... ओह... तुम भी एक नम्बर के बदमाश हो, मुझे अपनी बातों के जाल में फिर उलझा ही लिया ना, मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी है।"
"अरे किसी की प्यास बुझाने से पुण्य मिलता है।"
निशा अब पूरी तरह से गरम हो चुकी थी। उसके मन में कशमकश चल रही थी कि आगे बढ़े या नहीं। मैं जानता हूँ पहली बार की चुदाई से सभी डरतीं हैं। और वो तो अभी अनछुई कुँवारी कली थी। पर मेरा कार्यक्रम बिल्कुल सम्पूर्ण था। मेरे चुंगल से वो भला कैसे निकल सकती थी। उसने आँखें बन्द कर रखीं थीं।
फिर धीरे से बोली "बस एक बार ही देखना है और कोई शैतानी नहीं समझे ?"
"ठीक है बस एक बार एक मिनट और २० सेकेण्ड के लिए, ओके, पक्का... प्रॉमिस... सच्ची..." मैंने अपने कान पकड़ लिए। उसकी हँसी निकल गई।

दोस्तों मेरे कार्यक्रम का तीसरा और अन्तिम चरण पूरा हो गया था। मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। कमोबेश यही हालत निशा की भी थी। उसने काँपती आवाज़ में कहा "अच्छा पहले लाईट बन्द करो, मुझे शर्म आती है।"
"ओह... अँधेरे में क्या दिखाई देगा ? और फिर वो जंगली बिल्ली आ गई तो ?"
"ओह.. जीजू.. .तुम भी..." इस बार उसने एक नम्बर का बदमाश नहीं कहा और फिर उसने आँखें बन्द किए हुए ही काँपते हाथों से अपना टॉप थोड़ा सा उठा दिया...
उफ्फ... सिन्दूरी आमों जैसे दो रस-कूप मेरे सामने थे। ऐरोला कोई कैरम की गोटी जितना गुलाबी रंग का। घुण्डियाँ बिल्कुल तने हुए चने के दाने जितने। मैं तो बस मंत्रमुग्ध हो देखता ही रह गया। मुझे लगा जैसे मिक्की ही मेरे सामने बैठी है। उसके रस-कूप मिक्की से थोड़े ही बड़े थे पर थोड़े से नीचे झुके, जबकि मुक्की के बिल्कुल सुडौल थे. मैंने एक हाथ से हौले से उन्हें छू दिया। उफ्फ... क्या मुलायम नाज़ुक रेशमी अहसास था। जैसे ही मैंने उनपर अपनी जीभ रखी तो निशा की एक मीठी सी सीत्कार निकल गई।

"ओह जीजू... केवल देखने की बात हुई थी... ओह... ओह... या….. अब... बस करो... मुझे से नहीं रुका जाएगा..." मैंने एक अमृत कलश पर जीभ रख दी और उसे चूसना चालू कर दिया। निशा की सीत्कार अब भी चालू थी। "ओह... जी... जू.... मुझे क्या कर दिया तुमने... ओह.. हाआआय.. मुझे... आह। हाआआयय्य्ययय... ऊईईईईईई... माँ........ आआआहहहह... बस अब ओर नहीं, एक मिनट हो गया है" उसने मेरे सिर के बालों को अपने दोनों हाथों में ज़ोर से पकड़ लिया और अपनी छाती की ओर दबाने लगी। मैं कभी एक उरोज को चूसता, कभी दूसरे को। वो मस्त हुई आँखें बन्द किए मेरे बालों को ज़ोर से खींचती सीत्कार किए जा रही थी। इसी अवस्था में हम कोई ८-१० मिनट तो ज़रूर रहें होंगे। अचानक उसने मेरा सिर पकड़ कर ऊपर उठाया और मेरे होंठों को चूमने लगी, जैसे वो कई जन्मों की प्यासी थी। हम दोनों फ्रेंच किस्स करते रहे। फिर उसने मुझे नीचे ढकेल दिया और मेरे ऊपर लेट कर मेरे होंठ चूसने लगी। मेरा पप्पू तो अकड़ कर कुतुबमीनार बना पाजामे में अपना सिर फोड़ रहा था। मैं उसकी पीठ और नितम्बों पर हाथ फेर रहा था। क्या मुलायम दो ख़रबूज़े जैसे नितम्ब, कि किसी नामर्द का भी लंड खड़ा कर दे। मैंने उसकी गहरी होती खाई में अपनी उँगलियाँ फिरानी शुरु कर दी। उसकी चूत से रिसते कामरस से गीली उसकी चूत और गाँड का स्पर्श तो ऐसा था जैसे मैं स्वर्ग में ही पहुँच गया हूँ।

कोई ५ मिनट तक तो उसने मेरे होंठ चूसे ही होंगे। वैसे ही जैसे उस ब्लैक फॉक्स ने उस १५-१६ साल के लड़के के चूसे थे। फिर वो थोड़ी सी उठी और मेरे सीने पर ३-४ मुक्के लगा दिए। और बोली "जीजू तुमने आख़िर मुझे ख़राब कर ही दिया ना !"
मैंने धीरे से कहा "ख़राब नहीं प्यार करना सिखाया है"
"जीजू तुम एक नम्बर के बदमाश हो"
मैंने अपने मन में कहा 'मेरी रानी मैं एक नम्बर का नहीं दो नम्बर का भी बदमाश हूँ, थोड़ी देर बाद पता चलेगा' पर मैंने कहा "अरे छोड़ो इन बातों को जवानी के मज़ा लो, इस रात को यादगार रात बनाओ"

"नहीं जीजू, यह ठीक नहीं होगा। मैं अभी तक कुँवारी हूँ। मैंने पहले किसी के साथ कुछ नहीं किया। मुझे डर लग रहा है कोई गड़बड़ हो गई तो ?"

"अरे मेरी रानी अब इतनी दूर आ ही गए हैं तो डर कैसा तुम तो बेकार डर रही हो, सभी मज़ा लेते हैं। इस जवानी को इतना क्यों तडफा रही हो। अपने मन और दिल से पूछो वो क्या कहता है।" मैंने अपना राम-बाण चला दिया। मैं जानता था वो पूरी तरह तैयार है पर पहली बार है इसलिए डर रही है। मन में हिचकिचाहट है। मेरे थोड़े से उकसावे पर वह चुदाई के लिए तैयार हो जाएगी। चूत और दिल इसके बस में अब कहाँ हैं, वो तो कब के मेरे हो चुके हैं। बस ये जो दिमाग में थोड़ा सा खलल है, मना कर रहा है। मेरी परियोजना का अन्तिम भाग सफलता पूर्वक पूरा हो गया था। अब तो बस उत्पाद का उदघाटन करना था।

premguru
26-06-2009, 08:30 PM
Part-III
दोस्तों अब दिल्ली लुटने को तैयार थी...
मैंने उसका टॉप उतार दिया। दोनों क़बूतर आज़ाद हो गए। वो आँखें बन्द करके लेटी थी। होंठ काँप रहे थे। मैंने अभी तक उसकी चूत को हाथ भी नहीं लगाया था। आप तो जानते हैं मैं प्रेम गुरु हूँ और जल्दीबाज़ी में विश्वास नहीं रखता हूँ। मैं तो उसके मुँह से कहलवाना चाहता था कि 'मुझे चोदो'। अब मैंने उसके होठों पर उसके होंठ रख दिए। उसके नरम नाज़ुक रसीले होठ नहीं जैसे शहद से भरी फूलों की पँखुड़ियाँ हों। मैंने उसे गालों पर, पलकों पर, माथे पर, गले पर, कान पर, दोनों उरोजों पर, और नाभी पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी। वो आआहहह... उहहहह... करती जा रही थी। अपने पैर पटक रही थी। उसकी सीत्कार तेज़ होती जा रही थी। वो बोली "ये मुझे क्या होता जा रहा है..." वो रोमांच से काँप रही थी। मैं जानता था अब वह झड़ने वाली है। अरे वो तो बिल्कुल कच्ची कली ही निकली। उसका शरीर अकड़ा और उसने मेरे होंठ ही काट लिए। उसके नाखून मेरी पीठ पर चुभ रहे थे। उसने एक हल्की सी सिसकारी मारी। लगता है उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया। फिर वह ठंडी पड़ गई।

मैंने अपने कपड़े उतार दिए। सिर्फ चड्डी पहनी रखी। पप्पू महाराज ने अपना सिर चिपकी हुई चड्डी से भी बाहर निकाल ही लिया। उस बेचारे के क्या दोष था। अब निशा की बेल-बॉटम हटाने का वक्त आ गया था। निशा आँखें बन्द किए लेटी थी। मैंने उसकी सैलेक्स (सूती के पाजामे जैसी) के इलास्टिक को धीरे-धीरे नीचे करना शुरु किया। (उसने फिर बत्ती बन्द करने को कहा, तो मैंने कहा कि वो जंगली बिल्ली आ गई तो तुम्हारा दूध पी जाएगी और मैं भूखा ही रह जाऊँगा, रहने दो) निशा ने अपने चूतड़ थोड़े से ऊपर कर दिए। प्यारे पाठकों, और पाठिकाओं ! अब तो स्वर्ग का द्वार बस एक दो इंच ही रह गया था। चूत का अनावरण होने ही वाला था। मेरा पप्पू तो ठुमके पर ठुमका लगा रहा था। उसने तीन-चार वीर्य की पहली बूँदें छोड़ ही दीं। वो तो इस स्वर्ग के द्वार के दर्शन के लिए कब से बेताब़ था।

पहले छोटे-छोटे रेशमी बाल (उन्हें झाँट तो कतई नहीं कहा जा सकता) नज़र आए, और फिर किशमिश का दाना और फिर दो भागों में बँटी हुई उसकी नाज़ुक सी मक्खन मलाई सी चूत की फाँकें। गुलाबी रंगत लिए हुए। चूत के दोनों होठों पर हल्के-हल्के बाल। बीच में हल्की चॉकलेटी रंग की मोटी सी दरार। चीरे की लम्बाई ३ इंच से ज़्यादा बिल्कुल नहीं थी। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, ऊपर और नीचे के होंठों में रत्ती फर भी फ़र्क नहीं था। मोटे-मोटे गुलाबी रंग के संतरे की फाँके हों जैसे। दाईं जाँघ पर वो काला तिल। जैसे मेरे कत्ल का पूरा इन्तज़ाम किए हो। उसकी चूत काम-रस से सराबोर नीम गीली थी। मैंने अपने हाथों की दोनों उँगलियों से उसकी चूत की दोनों पंखुड़ियों को धीरे से चौड़ा किया। एक हल्की सी 'पट' की आवाज़ के साथ एक गहरा सा चीरा खुल गया।

उफ्फ.. सुर्ख लाल पकौड़े जैसी चूत एक दम गुलाबी रंग की थी। ऊपर अनार दाना, उसके नीचे मूत्र-छिद्र माचिस की तीली की नोक जितना बड़ा। आईला... और उसका फिंच... स्स्स्सी... का सिस्कारा तो कमाल का होगा। एक बार मूतते हुए ज़रूर चुम्मा लूँगा. मूत्र-छिद्र के ठीक एक इंच नीचे स्वर्ग-गुफ़ा का छोदा सा बन्द द्वार जिसमें से हल्का-हल्का सा सफेद पानी झर रहा था। मैंने अपनी जीभ जैसी ही उसकी मदन-मणि के दाने पर रखी तो उसकी एक सीत्कार निकल गई। मैंने जीभ को उसके मूत्र-छिद्र पर फिराया और फिर उसके स्वर्ग-द्वार पर। कच्चे नारियल, पेशाब और पसीने जैसी मादक सुगन्ध मेरे नथुनों में भर गई। कुछ मीठा, खट्टा, नमकीन सा स्वाद भला मैं कैसे नहीं पहचानता, जैसे मिक्की ही मेरे सामने लेटी हो। निशा तो अब किलकारियाँ मारने लगी थी। उसने अपने नितम्ब ऊपर-नीचे उठाते हुए अपनी चूत मेरे मुँह से चिपका दीं। मेरे सिर को दोनों हाथों से ज़ोर से पकड़ लिया और ज़ोर से बाल नोच लिए। इसमें उस बेचारी का क्या दोष। मुझे लगा अगर यही हालत रही तो मैं जल्दी ही गंजा हो जाऊँगा। पर अगर ऐसी चूत के लिए गंजा भी होना पड़े तो कोई ग़म नहीं।

उसने उत्तेजना में अपने पाँव ऊपर उठा लिए और मेरे गले के गिर्द लिपट दिए ज़ोर से। मैंने उसकी पूरी की पूरी चूत को अपने मुँह में भर लिया था, वह थी भी कितनी, एक छोटे परवल या सिंघाड़े जितनी ही तो थी। मैंने उसे ज़ोर से चूसा तो निशा ने इतनी ज़ोर की किलकारी मारी कि अगर बाहर तेज़ बारिश और बिजली नही कड़क रही होती तो पड़ोस वाले अवश्य ही सुन लेते। उसके साथ ही उसकी चूत ने कोई ३-४ चम्मच शहद जैसे मीठे नमकीन खट्टे नारियल पानी और पेशाब की मिली-जुली सुगन्ध जैसे काम-रस छोड़ दिया जिससे मेरा मुँह लबालब भर गया। सही मायने में निशा का यह पहला स्खलन था। मैं तो उसे चटकारे लेकर पी ही गया।

दोस्तों, २ उत्पादों की लाँचिंग सफलतापूर्वक हो गई थी। अब चूत और गाँड की चुदाई तथा लंड चुसवाना बाकी था। सबसे पहले चूत की बारी थी, फिर लंड-चुसाई और अन्त में गाँड। आईये अब चूत-रानी का उदघाटन करते हैं। आप तैयार है ना। मेरा पप्पू तो मुझे आज ज़िन्दा नहीं छोड़ेगा। बहुत तड़पाया है इस चूत ने उसे। पूरे २ घंटे से एकदम सावधान की स्थिति में सलामी मार रहा है। निशा बेसुध सी आँखें बन्द किए लेटी थी। थोड़ी देर बाद उसने अपनी जाँघों की कैंची ढीली की और मेरा सिर पकड़ कर ऊपर की ओर सरकाया और अपने होंठ मेरे होंठों पर रखकर चूसने लगी। २-३ मिनट चूसने के बाद वो बोली "जीजू मुझे पता नहीं ये क्या होता जा रहा है। एक मदहोशी सी छा रही है। कुछ करो ना... उफ्फ... हाय्य्य्यययय..." एक ज़ोर की सीत्कार उसने ली। लगता था वो एक बार फिर झड़ गई है।

मैं उसके ऊपर आ गया। मैंने अपनी चड्डी फाड़ फेंकी। मेरा ७" का पप्पू आज तो लोहे की तरह सख़्त था। उसकी लम्बाई आधा इंच बढ़कर ७.५ इंच हो गई थी। मैंने कहा "क्या करूँ मेरी जान ?"
"ओह... जीजू... अब मत तरसाओ... कर लो अपने मन की। ओह आप मेरे मुँह से क्या सुनना चाहते हैं। मुझे शर्म आती है। प्लीज़..." कुछ ना कहते हुए भी उसने सबकुछ कह दिया था। मैंने अपने लंड को उसकी चूत पर लगा दिया।

"ऊईईईई... माँआआ.... ओहहहह... जीजू वो... वो... निरोध (कॉण्डोम) तो लगा लो" निशा की आवाज़ काँप रही थी।
"मेरी रानी निरोध से मज़ा नहीं आएगा।"
"पर वो... वो... अगर मैं गर्भवती हो गई तो...?"
"मेरी जान फिर तुम्हारा नया उत्पाद किस दिन काम आएगा ? सिर्फ एक महीने में एक गोली ?" मैंने कहा और मन में सोचा 'साली मुझे पपलू समझती है।'
"ओह... जीजू, तुम भी एक नम्बर के बदमाश हो..." और उसने मुझे कससकर अपनी बाँहों में भर लिया।
"नहीं, मैं तो २ नम्बर का बदमाश हूँ" मैंने कहा।
"क्या मतलब ?"
"वो बाद में अभी तो एक नम्बर का ही मज़ा लो।" और मैंने तकिये के नीचे से वैसलीन की डिब्बी से थोड़ी से वैसलीन निकाली और अपने लंड और निशा की चूत में एक उँगली भर कर गच्च से डाल दी। उसकी हल्की सी चीख निकल गई। मैंने ५-७ बार उँगली अन्दर-बाहर की। हे भगवान, साली की क्या मस्त सँकरी चूत है। एकदम कच्ची कली जैसी, फ़कत कुँवारी, कोरी रसमलाई जैसी। अब देर करना ठीक नहीं था।

मैंने अपने पप्पू को उसकी चूत के मुहाने पर रखा और उसकी कमर के नीचे एक हाथ डाला। उसके होंठों को अपने मुँह में भर लिया और फिर एक ही झटके में ३ इंच लंड अन्दर ठोंक दिया। निशा की घुटी-घुटी चीख निकल गई। मैं तो प्रेम-गुरु था। मुझे पता था वो ज़रूर चीखेगी, इसीलिए मैंने उसके होंठों को अपने मुँह में ले रखा था और उसकी कमर पकड़ रखी थी ताकि वो उछल कर मेरा काम ख़राब ना कर दे।
अभी धक्के मारने का समय नहीं हुआ था। कोई २-३ मिनट के बाद जब उसकी चूत कुछ आराम में आई और उसने पानी छोड़ा तब मैंने हौले-हौले धक्के लगाने शुरु किए पर अभी लंड पूरा नहीं घुसाया। मुझे पता था, अभी एक बाधा और बाक़ी है - उसकी झिल्ली, उसकी सील, उसकी नाज़ुक झिल्ली, उसकी कुँमारीच्छद। जिसके फटने का दर्द वो मुश्किल से सहन कर पाएगी। पर उसे भी तोड़ना था। मैंने उसके नितम्बों पर हाथ फेरना चालू रखा। उसकी गाँड के छेद से जैसे ही मेरी उँगलियाँ टकराईं तो मैं तो रोमांच से भर उठा. बालों की कंघी के दाँत जैसी गाँड की तीख़ी नोकदार सिलवटों वाला छेद। आहहहह... क्या मस्त क़यामत है साली की गाँड की छेद ।

आप चौंक गए ना। आपने रोमांटिक कहानियों में ज़रूर सुना होगा कि लड़कियों की गाँड की छेद मुलायम होती है। अगर कोई ऐसा कहता है तो या तो वह झूठ बोल रहा है या फिर वो गाँड ज़रूर १५-२० बार लंड खा चुकी है। गुरुजी कहते हैं कि कुँवारी गाँड की पहचान तो उसके उभरे हुए सिलवटों से होती है। अगर आप इस लज्जत को महसूस करना चाहते हैं तो एक संतरे की फाँक लेकर उसकी पतली सफ़ेद झिल्ली को हटा दें। अब उसके जोये नज़र आएँगे। अपनी आँखें बन्द करके उन पर अपनी ऊँगली फिराएँ आप उसका नाज़ुकपन महसूस कर सकेंगे। हे भगवान जिस लड़की ने अपनी चूत में भी कभी उँगली ना की हो उसकी अनछुई कोरी गाँड मार कर तो अगर इस दुनिया से जाना भी पड़े तो ये सौदा कतई घाटे वाला नहीं है। आज तो इस गाँड के छेद में अपना रस भर कर स्वर्ग के इस दूसरे दरवाज़े का लुत्फ हर क़ीमत पर उठाना ही है। पर अभी तो चूत की चुदाई चल रही है। गाँड की बात बाद में। पप्पू तो इस ख़्याल से ही अड़ियल टट्टू बन गया है। पता नहीं ये सब्र करना कब सीखेगा। उसने दो-तीन ठुमके चूत के अन्दर लगाए तो निशा की चूत ने भी उसे कस कर अन्दर भींच लिया।

मैंने उसके नितम्बों के नीचे एक तकिया और लगा दिया और अपना एक हाथ उसकी पतली कमर के नीचे डाल कर पकड़ लिया। अपने होंठ उसके होंठों पर रख करक उन्हें चूमा और फिर दोनों होंठ अपने मुँह में भर लिए। वो तो पूरी गरम और मस्त हो चुकी थी। उसने तो अब नीचे से हल्के-हल्के धक्के भी लगाने शुरु कर दिए थे। मैंने अपना लंड थोड़ा सा बाहर निकाला और एक ज़ोरदार धक्का लगा दिया। धक्का इतना ज़बर्दस्त था कि उसकी सील को तोड़ता हुआ गच्च से जड़ तक उसकी चूत में समा गया। निशा की घुटी-घुटी चीख़ बाहर कड़कड़ाती बिजली की आवाज़ में दब गई। वो दर्द के मारे छटपटाने लगी। उसने मेरी पीठ पर अपने नाखून इतने ज़ोर से गड़ाए कि मेरी पीठ पर भी ख़ून छलक आया। उसकी चूत से ख़ून का फव्वारा छूटा और मेरे लंड को भिंगोता हुआ तकिए पर गिरने लगा। निशा की कसमसाहट से उसके होंठ मेरे मुँह से निकलते ही वो ज़ोर से चीख़ी "ओईईईईई... माँ.... मर... गईईईईईईईई..." और उसकी आँखों से आँसू निकलने लगे।

मैंने उससे कहा "बस मेरी रानी अब दर्द खत्म ! अब तो बस आनन्द ही आनन्द है। बस अब चुप करो" मैंने उसके नमकीन स्वाद वाले आँसूओं पर अपनी जीभ रख दी। "जीजू आप भी एक नम्बर के कसाई हो, मुझे मार ही डाला... ओओईईईईई... बाहर.. निकालो.. मैं मर जाऊँगी... उईईईईई माँआआआआ...." वो रोए जा रही थी। मैं जानता ता ये दर्द ३-४ मिनट का है बाद में तो बस मज़े ही मज़े। मेरा पप्पू तो जैसे निहाल ही हो गया। इतनी कसी हुई चूत तो मधु की भी नहीं लगी थी, सुहागरात में।

कोई ५ मिनट के बाद निशा कुछ संयत हुई। उसकी चूत ने भी फिर से रस छोड़ना चालू कर दिया। मैंने उसकी कपोलों, होंठों और माथे पर चुम्बन लेने शुरु कर दिए। फिर मैंने उससे पूछा "क्यों मेरी मैना, अब दर्द कैसा है ?" तो वह बोली "जीजू आपने तो मेरी जान ही निकाल दी, कोई कुँवारी लड़की को ऐसे चोदता है ?"
"देखो अब जो होना था हो गया हा, अब तो बस इसके आगे स्वर्ग का सा आनन्द ही आनन्द है" और मैंने हौले-हौले धक्के लगाने शुरु कर दिए। निशा को भी अब थोड़ा मज़ा आने लगा था। मैंने कहा "मेरी मैना, अब तुम कली से फूल बन गई हो और मैं तुम्हारा मिट्ठू"

निशा की हँसी निकल पड़ी और उसने २-३ मुक्के मेरी पीठ पर लगाते हुए कहा "तुम पूरे एक नम्बर के बदमाश हो। अपने शब्द जाल में फँसा कर आख़िर मुझे ख़राब कर ही दिया।" मैंने एक धक्का और लगाया तो वह चिहुँकी "ओईईई... आआहह... या... ओह अब रूको मत ऐसे ही धक्के लगाओ... आहहह... या.. ओई... मैं तो गईईईईईईई...." और उसके साथ ही वो एक बार फिर झड़ गई। मैं तो जैसे स्वर्ग में था। मैंने लगातार ८-१० धक्के और लगा दिए। अब तो उसकी चूत से फच्च-फच्च का मधुर संगीत बजने लगा था।

ये सिलसिला कोई २० मिनट तो ज़रूर चला होगा। मेरा पप्पू बेचारा कब तक लड़ता। आख़िर उसको भी शहीद होना ही था। मैंने दनादन ५-७ धक्के और लगा दिए। निशा भी फिर से झड़ने के कगार पर ही तो थी। और फिर... एक.. दो... तीन चार... पाँछ.. पता नहीं कितनी पिचकारियाँ मेरे पप्पू ने छोड़ दीं... निशा ने मुझे कस कर पकड़ लिया और उसकी चूत ने भी काम-रज छोड़ दिया। उसकी बाँहों में लिपटा मैं कोई १० मिनट उसके ऊपर ही पड़ा रहा।

१० मिनट के बाद निशा जैसे नींद से जागी। मैं उठ कर बैठ गया। निशा भी मेरी ओर सरक आई। उसने मेरे होंठों पर दो-तीन चुम्बन ले लिए। मैंने उस से थैंक यू कहा तो उसने कहा "गन्दे बच्चे मेरे प्यारे मिट्ठू..." और मेरी नाक पकड़ कर ज़ोर से दबा दी। मेरे तीसरे उत्पाद की लाँचिंग की ये बधाई ही तो थी।

मैं उसे गोद में उठा कर बाथरूम की ओर ले जाने लगा। उसने अपनी बाँहें मेरे गले में डाल दी और आँखें बन्द कर लीं। मैंने देखा पूरा तकिया मेरे वीर्य, निशा के ख़ून, और काम-रज़ से भीगा हुआ था। मैंने एक हाथ से उस तकिए को उल्टा कर दिया ताकि निशा इतना ख़ून देखकर डर ना जाए।

निशा पॉट पर बैठकर पेशाब करने लगी। आहहहह... फिच्च... स्स्स्सीईईई... का वो सिसकारा और मूत की पतली धार तो मिक्की जैसी ही थी। मैं तो मन्त्र-मुग्ध सा बस उस नज़ारे को देखता ही रह गया। पॉट पर बैठी निशा की चूत ऐसी लग रही थी जैसे किसी ने मोटे शब्दों में अंग्रेज़ी में 'W' (डब्ल्यू) लिख दिया हो। उसकी चूत ऐसी लग रही थी जैसे एक छोटा करेला किसी ने छील कर बीच में से चीर दिया हो। चूत के होंठ सूजकर पकौड़े जैसे हो गए थे। बिल्कुल लाल गुलाबी। उसकी गाँड का भूरा और कत्थई रंग का छोटा सा छेद खुल और बन्द हो रहा था। मुझे अपने चौथे उत्पाद की याद आ गई... अरे भई लंड भी तो चुसवाना था ना। मैंने उससे कहा "एक मिनट रूको, मूतना बन्द करो और उठो... प्लीज़ जल्दी"
"क्या हुआ?" निशा ने मूतना बन्द कर दिया और घबरा कर बीच में ही खड़ी हो गई। मैंने उसे अपनी ओर खींचा। मैं घुटनों के बल बैठ गया और उसकी चूत को दोनों हाथों से खोल करक उसकी मदन-मणि के दाने को चूसने लगा। वो तो आहहह... उहह्हह करती ही रह गई। उसने कहा "ओह... क्या कर रहे हो जीजू ओफ्फ्फ.. इसे साफ तो करने दो। ओह गन्दे बच्चे ओईईईई.. माँ..."

यही तो मैं चाहता था। मैं जानबूझ कर उसकी वीर्य और काम-रज से भरी चूत को चूस कर ये दिखाना चाहता था कि चुदाई में कुछ भी गन्दा नहीं होता, ताकि वह मेरा लण्ड चूसने में कोई कोताही ना बरते और कोई आनाकानी ना करे। "अरे प्यार में कुछ गन्दा नहीं होता" मैंने कहा। और फिर उसके किशमिश के दाने को चूसने लगा।

निशा कितनी देर तक बर्दाश्त करती। उसकी चूत के मूत्र-छिद्र से हल्की सी पेशाब की धार फिर चालू हो गई जो मेरी ठोड़ी से होती हुई गले के नीचे गिर सीने से होती मेरे प्पू और आँडों को जैसे धोती जा रही थी। उसने मेरे सिर के बाल पकड़ लिए कसकर। मैं तो मस्त हो गया। जब उसका पेशाब बन्द हुआ तो उसने नीचे झुक कर मेरे होंठ चूम लिए और अपने होठों पर जीभ फिराने लगी। उसे भी अपनी मूत का थोड़ा सा नमकीन स्वाद ज़रूर मिल ही गया।

हमने हल्का सा शॉवर लिया और साफ़-सफाई के बाद फिर बिस्तर पर आ गए। मैं बिस्तर पर टेक लगा कर बैठ गया। निशा अचानक उछली और मुझे एक तरफ लुढ़काते हुए मेरे पेट पर बैठ गई। उसकी दोनों टाँगें मेरे पेट के दोनों तरफ थी और उसके घुटने मुड़े हुए थे। उसने अपने होंठ मेरे होठों पर रख कर दो-तीन चुम्बन तड़ातड़ ले लिए। उसके सिन्दूरी आम मेरे सीने से लगे थे और उसके नितम्बों के नीचे मेरा पप्पू पीस रहा था। वो अपनी चूत और नितम्बों को भी थोड़ा-थोड़ा सा घिस रही ती। ऐसा करते हुए उसने अपनी जीभ की नोक से मेरी नाक चाटी और उसकी नोक अपने मुँह में लेकर चूसने लगी। आईलाआआआ... मैं तो मस्त ही हो गया।

प्यारे दोस्तों ! आप सोच रहे होंगे कि इसमें मस्त होने वाली क्या बात है ? नाक होंठ गाल तो हर लड़की चूस ही लेती है। आप गलत सोच रहे हैं। शायद आप औरतों की इस अदा को नहीं जानते। मेरी प्यारी पाठिकाएँ ज़रूर हँस रहीं हैं। वो अच्छी तरह इसका मतलब जानती हैं। नहीं समझे ना ? चलो मैं बता देता हूँ...

इस बात से आप सहमत हैं ना कि जब कोई लड़का या आदमी किसी लड़की या औरत को कहता है कि तुम बहुत खूबसूरत हो तो इसका मतलब साफ़ होता है कि वह उसे चोदना चाहता है। दूसरी बात जब आदमी किसी लड़की के होंठ चूसता है तो वो मन में सोच रहा है कि ये उसकी चूत वाले होंठ ही हैं। और इसी तरह जब कोई लड़की किसी आदमी की नाक चूस रही होती है तो अनजाने में उसका लण्ड ही चूस रही है। थोड़ा सा सब्र रखिए अभी पता चल जाएगा।

"निशा एक बताना तो मैं भूल ही गया" मैंने कहा।
"ऊँहह... अब कुछ मत बोलो बस मुझे प्यार करने दो अपने मिट्ठू को।" उसने फिर मेरे होठों को चूम लिया।
"आदमी के लण्ड की लम्बाई बिना नापे पता करनी हो तो कैसे पता करेंगे ?"
"कैसे... क्या मतलब ?"
"आदमी की नाक की लम्बाई से ३ गुणा बड़ा उसका लण्ड होता है।" मैंने कहा तो हैरानी से वो मेरी नाक देखने लगी "ओह... नो..."

"नाप कर देख लो" वो मेरी नाक चूमना छोड़ कर एक ओर हो गई और मैं बैठ गया। अब उसने मेरे पप्पू की ओर देखा और हाथ में लेकर उसे मसलने लगी। पप्पू तो बस इसी इन्तज़ार में था। उसने फिर ठुमके लगाने चालू कर दिए। दोस्तों अब लण्ड चुसवाने की बारी थी। मैं जानता हूँ पहली बार लण्ड चूसने में हर लड़की नखरे करती है और उसे गन्दा काम समझती है। पर मैं भी प्रेम-गुरु ऐसे ही नहीं बना हूँ। मैंने भी पूरा तैयार की थी इस उत्पाद की लाँचिंग की।

मैंने उससे कहा "मेरी मैना मैं एक बार तुम्हारी मुनिया को चूसना चाहता हूँ।" भला उसे क्या ऐतराज़ हो सकता था। मैं लेट गया और उसके पैर अपने सिर के दोनों ओर कर दिए जिससे उसकी चूत मेरे मुँह के ठीक ऊपर आ गई। हम दोनों अब 69 की मुद्रा में थे। निशा मेरे ऊपर जो थी। मेरा पप्पू ठीक उसके मुँह के सामने था। मैंने झट से चूत की पंखुड़ियों को चौड़ा किया और गप्प से अपनी जीभ उस गुलाबी खाई में उतार दी। उत्तेजना में उसका शरीर काँपने लगा। मैंने उसकी चूत को ज़ोर-ज़ोर से चूसना चालू कर दिया, अब उसके पास मेरे लंड को चूसने के अलावा क्या रास्ता बचा था। उसने पहले मेरे पप्पू के सुपाड़े को चूमा और उसपर आए प्री क्युम की कुछ बूँदों चखा और फिर गप्प से उसे मुँह में भर कर चूसने लगी। आह... उसका नरम गीला और थोड़ा कुनकुना अहसास मुझे मस्त करक गया। मेरा पप्पू तो निहाल ही हो गया। मैंने अपनी जीभ उसकी गाँड के भूरे छेद पर भी फिरानी चालू कर दी। मुझे अपना पाँचवा उत्पाद भी तो लाँच करना था। अरे भई गाँड भी मारनी थी ना। उसके लिए निशा को तैयार करना सबसे मुश्किल काम था। मैंने ४-५ बार अपनी जीभ उसकी गाँड पर फिराई तो वो एक किलकारी मारते हुए फिर झड़ गई। मैं अपना वीर्य उसके मुँह में अभी नहीं छोड़ना चाहता था। मुझे तो पहले उसकी गाँड का उदघाटन करना था। और फिर जैसा मैंने सोचा था वही हुआ।

premguru
26-06-2009, 08:31 PM
निशा ज़ोर-ज़ोर की साँसे लेती हुई एक ओर लुढ़क गई। उसके उरोज साँसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। आँखें बन्द थीं। अचानक वह उठी और मेरे ऊपर आ कर मुझे कस कर अपनी बाँहों में जकड़ लिया। मैंने अपनी ऊँगली उसकी गाँड की छेद पर फिरानी शुरु कर दी। उफ्फ... क्या खुरदरा एहसास था। वो तो बस आँखें बन्द किए मुझसे चिपकी पड़ी थी। मैंने हौले से उसके होंठों पर एक चुम्मा लिया और कहा "मेरी रात कली, मेरी मैना क्या हुआ ?"

"बस अब कुछ मत बोलो, एक बार मुझे फिर से..." और उसने मुझे चूम लिया।
"निशा एक और मज़ा लोगी ?"
"क्या मतलब ?" उसने चौंकते हुए मेरी तरफ़ देखा।
"मैं और मधु स्वर्ग के दूसरे द्वार का भी ख़ूब मज़ा लेते हैं।"
"क्या मतलब... वो... वो.. ओह... नो... नहीं..." वो तो ऐसे बिदकी जैसे किसी काली छतरी को देख कर भैंस बिदकती है "ओह जीजू तुम्हारा दिमाग तो ठीक है ना... क्या बात कर रहे हो?"

"अरे मेरी मैंना रानी औरत के तीन छेद होते हैं और तीनों में ही चुदाई की जाती है। चुदाई का असली आनन्द तो इस द्वार में ही है। एक बार मज़ा लेकर ते देखो, फिर तो रोज़ यही कहोगी कि अपना पेन ड्राईव अगले छेद में नहीं, मेरे पिछले छेद में ही डालो।"

"नहीं आप झूठ बोल रहे हैं। भला कोई इसमें करता है ?"
"अरे इसमें झूठ वाली क्या बात है। मधु तो इसकी दीवानी है। हल तो हर शनिवार को इसका मज़ा लेते हैं।"
"ओह... अब मैं समझी मधु दीदी रविवार को थोड़ी टाँगें चौड़ी करके... ओह... इस्स्स..." जिस तरह निशा शरमाई थी मैं तो मर ही मिटा उसकी इस अदा पर। चिड़िया फँस जाएगी।
"देखो अब तक मैंने जितनी भी बातें तुम्हें बताई हैं क्यो कोई भी बात ग़लत निकली ?"
"पर वो... वो.. इतना मोटा मेरे छोटे से छेद में... ओह नो... मुझे डर लगता है।" वो कुछ सोच नहीं पा रही थी।
"अच्छा चलो एक टोटका तुम्हें दिखाता हूँ। अगर तुम्हें सही लगे तो ठीक, नहीं तो कोई बात नहीं, गाँड मारना रद्द" मैंने कहा
"वो क्या है ?"

दोस्तों अब तो भरतपुर लुटने को तैयार होने ही वाला है। बस २ मिनट की ओर देरी है। मैंने उससे कहा कि तुम उकड़ूँ बैठ जाओ। वह बैठ गई। अब मैंने तकिये के नीचे से बोरोलीन की ट्यूब निकाली ओर उसकी उँगली पर एक मटर के दाने जितनी क्रीम लगा दी। फिर उससे कहा कि तुम इसी अपनी मुनिया की पड़ोसन (गाँड पर यार) लगा लो। उसने ऐसा ही किया। अब मैंने उससे कहा कि खड़ी हो जाओ। वह खड़ी हो गई। फिर मैंने उसे बैठ जाने को कहा और एक छोटा सा शीशा जो मैंने उसके लैपटॉप के बैग से निकाला था उसकी गाँड की छेद ke neeche रख दिया और कहा कि इस शीशे में अपनी रानी की शक्ल तो देखो जितनी दूर तक क्रीम फैल गई है, अगर लंड की मोटाई उस घेरे जितनी या कम है तो गाँड रानी को कोई परेशानी नहीं होगी। क्रीम का घेरा आयोडेक्स के शीशी के ढक्कन जितना था। मेरा लंड भी कमोबेश उतना ही मोटा तो है।
उसे तो जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था। "पर... वो... वो... नहीं मुझे बहुत डर लग रहा है। सुना है इसमें करने पर बहुत दर्द होता है।"
"अच्छा चलो तुम्हें दर्द होगा तो नहीं करेंगे। एक बार प्रयास करने में क्या हर्ज़ है ?"
"पर वो... वो ज़्यादा दर्द तो नहीं होगा ना कहीं...?" वो कुछ हिचकिचा रही थी। पर मेरा फ्लो-चार्ट और कार्यक्रम बिल्कुल पक्का था। अब बचना कहाँ संभव था।

मैंने उसे करवट लेकर सो जाने को कहा। वो बाईं करवट के बल लेट गई औऱ अपनी दाईं टाँग को सिकोड़ कर अपने सीने की ओर कर लिया। शायद आप सोच रहे होंगे 'गाँड मारने का ये कौन सा आसन हुआ। गाँड तो कुत्ते अथवा बिल्ली की मुद्रा में ही अच्छी तरह मारी जा सकती है?'

आप ग़लत सोच रहे हैं। लगता है आपने गाँड ना तो मरवाई है और ना ही मारी है। पहली गाँड चुदाई बड़ी ही सावधानी से की जाती है। पहली गाँड चुदाई में लड़की को ज़्यादा दर्द नहीं होना चाहिए नहीं तो बाद में लड़की कभी गाँड नहीं मरवाएगी। अब मैं घुटने मोड़कर उसकी बाईं जाँघ पर बैठ गया। इस तरह से जब मैं उसकी गाँड में लंड डालूँगा तो वह आगे की ओर नहीं खिसक पाएगी। कुतिया या घोड़ी शैली में यही तो मुश्किल होती है, जब भी आप धक्का लगाएँगे तो लड़की आगे की ओर हो जाएगी और लंड उसकी गाँड से फिसल जाएगा। ५-७ धक्कों के बाद आप बाहर ही खल्लास हो जाएँगे।

अब मैंने बोरोलीन की ट्यूब निकाली और टोपी खोल कर उसका मुँह उसकी गाँड की सुनहरी छेद पर लगा कर थोड़ा सा अन्दर किया। पहले से थोड़ी बोरोलीन लगी होने से ट्यूब की नॉब अन्दर चली गई। अब मैंने उस ट्यूब को ज़ोर से भींच दिया। "उईईईई... जीजूऊऊऊ गुदगुदी हो रही है" निशा थोड़ा सा चिहुँकी। वो आगे को सरक ही नहीं सकती थी। मैंने आधी से ज़्यादा ट्यूब उसकी गाँड में खाली कर दी। अब धीरे-धीरे मैंने उसकी गाँड के छेद पर मालिश करनी शुरु कर दी। बोरोलीन अन्दर पिघलने लगी थी। और मेरी उँगली उसकी गाँड की कसी हुई छेद के बावज़ूद भी आराम से अन्दर जाने लगी थी, प्यार से धीरे-धीरे। मुझे इस काम में कोई जल्दी नहीं करनी थी। मैं तो गाँड मारने का पक्का खिलाड़ी हूँ। निशा आआआहहह... उउउऊऊऊहहहह करने लगी। कोई ४-५ मिनट की घिसाई और उँगलीबाज़ी से उसकी गाँड तैयार हो गई थी। "ओह... जीजू अब डाल दो"
शाबास मेरी मैंना यही तो मैं चाहता था। अब मैंने वैसलीन की डिब्बी उठाई और लगभग आधी शीशी क्रीम अपने पप्पू पर लगा दी। आपको तो पता है मेरा सुपाड़ा आगे से थोड़ा पतला है। गाँड मारने के लिए अति उत्तम। मैंने सुपाड़े को उसकी गाँड पर लगा दिया। आह... क्या मस्त छेद था। दो गोल पहाड़ियों के बीच एक छोटी सी गुफ़ा जिसका दरवाज़ा कभी बन्द कभी खुल रहा था। निशा आआहहहह... उँहहहह... ओह... उउउऊऊईई.. किए जा रही थी।

दोस्तों और सहेलियों अब मेरे पाँचवें और अन्तिम उत्पाद की लाँचिंग थी। अगर आपको थोड़ा बहुत गाँडबाज़ी का शौक और अनुभव हो तो आप ज़रूर जानते होंगे कि सबसे कठिन काम गाँड के छल्ले को पार करना होता है। एक बार अगर सुपाड़ा उस छल्ले को पार कर गया तो समझो क़िला फ़तह हो गया। अन्दर तो बस गुब्बारे की तरह खाली कुँआ होता है। आप को बता दूँ लण्ड चाहे जितना भी बड़ा क्यों ना हो, गाँड में जड़ तक चला जाएगा बस छेद का घेरा एक बार पार होना चाहिए।

आप सोच रहें होंगे यार एक धक्का लगाओ और ठोंक दो किल्ला, क्यों तड़पा रहे हो अपने लंड और बेचारी गाँड को। कहीं आप का भी खड़ा तो नहीं हो गया या फिर मेरी प्यारी पाठिकाओं ने अपनी मुनिया में उँगली करनी तो शुरु नहीं कर दी ? मुझे पक्का यकीन है आप की पैन्टी ज़रूर गीली हो गई है। चाहो तो देख लो।

मैंने एक उँगली उसकी चूत में डाल कर अन्दर-बाहर करनी शुरु कर दी औऱ एक हाथ से उसकी घुण्डियाँ मसलनी शुरु कर दी। उसका एक बार और झड़ना ज़रूरी था ताकि गाँड के छेद को पार करवाने में उसे कम से कम दर्द हो। ३-४ मिनट की उँगलीबाज़ी और चुचियों को मसलने से वह उत्तेजित हो गई। उसका शरीर थोड़ा सा अकड़ने लगा और वो ऊईईई.. माँ.आआ.... ओओओहहह ययाआआआआ... करने लगी। उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया। मैंने अपनी उँगली निकाली और अपने मुँह में डाल कर एक चटखारा लिया। फिर मैंने दुबारा उँगली उसकी चूत में डाली और उसे भी चूत-रस चटाया। निशा तो मस्त ही हो गई। उसकी गाँड का छेद जल्दी-जल्दी खुलने और बन्द होने लगा था। यही समय था स्वर्ग के दूसरे द्वार को पार करने का। जैसी उसकी गाँड खुलती मेरा सुपाड़ा थोड़ा सा अन्दर सरक जाता। अब तक उसकी गाँड का छेद ५ रुपए के सिक्के जितना खुल चुका था और लगभग पौना इंच सुपाड़ा अन्दर जा चुका था, सफलतापूर्वक बिना किसी दर्द के। मैंने उसकी कमर को पकड़ा और ज़ोर का (धक्का नहीं यार) दबाव डालना चालू किया। (मुर्गी को हलाल किया जाता है झटका नहीं) गाँड अन्दर से चिकनी थी और निशा मस्त थी। गच्च से ३ इंच लण्ड घुस गया और इससे पहले कि निशा की चीख हवा में गूँजे मैंने उसका मुँह अपने दाएँ हाथ से ढँक दिया। वो थोड़ा सा कसमसाई और गूँ-गूँ करने लगी। मैं शान्त रहा। मेरा ३ इंच लण्ड अन्दर जा चुका था। अब फिसल कर बाहर नहीं आ सकता था। मुझे डर था कि चूत की तरह गाँड से भी ख़ून ना निकल जाए। लेकिन बोरोलीन और वैसलीन की चिकनाई की वज़ह से उसकी गाँड फटने से बच गई थी। इसका एक कारण और भी था मैंने लण्ड अन्दर डालते समय केवल दबाव ही दिया था धक्का नहीं मारा था।

२-३ मिनट आह... ऊहह... करने के बाद वह शान्त हो गई। मैंने अपना हाथ हटा लिया तो वह बोली "मुझे तो मार ही डाला"
"अरे मेरी मैना अब देखना तुम अपने मुँह से कहोगी और ज़ोर से ठोंको और ज़ोर से"
"हटो गन्दे बच्चे !"

अब धीरे-धीरे धक्के लगाने का समय आ गया था। मैंने अपना लण्ड अन्दर-बाहर करना शुरु कर दिया। निशा ने अपने गाँड का छेद सिकोड़ने की कोशिश की तो मैंने उसे समझाया कि वो कतई ऐसा न करे। मैंने उसे बताया कि अगर उसने गाँड को सिकोड़ तो अन्दर लंड और सुपाड़ा दोनों फूल जाएँगे और उसे अधिक तक़लीफ होगी। दोस्तों आपको पता होगा कि गाँड मरवाते समय अगर लड़की अपनी गाँड को अन्दर की ओर सिकोड़ ले जैसे मूत रोकने के लिए किया जाता है तो लण्ड और सुपाड़ा अन्दर फूल जाते हैं और फिर मोटे लण्ड से गाँड फटने को कोई नहीं रोक पाएगा।

मैंने अपना लंड जड़ तक अन्दर कर दिया. निशा तो मस्त हो गई। वो तो बस उईई... माँ.... ही करती जा रही थी, मीठी सी सीत्कार। मैं अपना लण्ड अन्दर-बाहर ही करता जा रहा था। वैसे पूछो तो गाँड का असली मज़ा तो बस ३-४ इंच तक ही होता है, उसके आगे तो पता ही नहीं चलता, आगे तो कुँआ ही होता है। निशा अब पेट के बल हो गई थी, उसने अपने दोनों पैर चौड़े कर दिए और नितम्ब ऊपर उठा दिए। मेरा लंड उसकी गाँड में कस गया पर चिकनाई के कारण अन्दर-बाहर होने में कोई दिक्क़त नहीं थी। हर धक्के के साथ निशा की सीत्कार निकल जाती और वह अपने नितम्ब और ऊपर कर लेती. साली पहली गाँड चुदाई में ही इतनी मस्त हो गई, मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि इतनी ज़बर्दस्त गाँड होगी। ऐसा नहीं था कि मैं बस धक्के ही लगा रहा था, मैं तो उसकी चूत में भी उँगली कर रहा था, कभी उसकी पीठ चूमता, कभी उसके कान काटता। वो तकिए से सिर लगाए आराम से अपना नितम्ब ऊपर-नीचे करती हुई ओओईईई... आआआहहह... ययाआआआ... कर रही थी।

मैंने १५-२० औरतों की गाँड तो ज़रूर मारी होगी, पर निशा जैसी गाँड तो किसी की भी नहीं थी। मधु की गाँड जब भी मैंने पहली बार मारी थी तो वो तो बेहोश सी हो गई थी पर मेरी ये मैना तो सबसे मस्त निकली। मैं मिक्की की गाँड नहीं मार पाया था पर मेरा अनुमान है कि निशा की गाँड मिक्की से भी किसी भी हालत में कमतर नहीं है। कोई २०-२५ की गाँड चुदाई के बाद मुझे लगा कि अब मंज़िल नज़दीक आने वाली है तो मैंने निशा से कहा
"मेरी मैना, तोता अब उड़ने वाला है"
निशा हँसने लगी "अभी नहीं, एक बार मुझे कुतिया बनाकर भी करो।"
और फिर वो अपने घुटनों के बल हो गई। मैं समझ गया साली गोरी फिरंगन और ब्लैक-फॉक्स वाली ब्लू-फिल्म की तरह चुदवाना चाहती है। मैंने उसकी कमर पकड़ी और लंड अन्दर डाल कर धक्के लगाने शुरु कर दिए। उसकी गाँड का छल्ला ऐसे लग रहा था जैसे किसी बच्ची के हाथ में पहनने वाली लाल रंग की चूड़ी हो या एक पतली सी गोल लाल रंग की ट्यूब-लाईट हो जो जल और बुझ रही हो। उसकी गाँड का छल्ला ऐसे ही अन्दर-बाहर हो रहा था। उसने अपना सिर तकिए से लगा लिया और मेरे आँडों को ज़ोर से अपनी मुट्ठी में लेकर दबाने लगी। मेरे ८-१० धक्कों और चूत में उँगलीबाज़ी करने के कारण निशा की चूत ने पानी छोड़ दिया और उसने एक मीठी सी सीत्कार लेकर अपनी गाँड सिकोड़ी। इसके साथ ही मेरे लंड ने भी ७-८ पिचकारियाँ उसकी गाँड में छोड़ दीं। उसकी गाँड मेरे गरम और गाढ़े वीर्य से लबालब भर गई। जैसे-जैसे मेरे धक्कों की रफ़्तार कम होती गई वो नीचे होती गई और फिर मैं उसके ऊपर लेटता चला गया। मैंने उसे बाँहों में भर रखा था। उसके दोनों उरोज मेरे हाथों में थे।
कोई १० मिनट तक आँखें बन्द किए हम लोग ऐसे ही पड़े रहे। फिर निशा उठ खड़ी हुई। वो लंगड़ाती सी बाथरूम की ओर जाने लगी तो मैंने उसका हाथ पकड़ कर फिर अपनी गोद में बैठा लिया। "ओह सारा पानी मेरी जाँघों पर फैलता जा रहा है, मुझे गुदगुदी हो रही है.. ओह... छोड़ो साफ़ तो करने दो।"
पर मैंने उसे नहीं जाने दिया। मैंने तकिए के नीचे से नैपकीन निकाली और निशा की चूती (रिसती) हुई गाँड को साफ कर दिया। उसकी गाँड का छेद अब बिल्कुल लाल होकर ५ रुपए के सिक्के जितना छोटा हो गया था। छेद की शक्ल अंग्रेजी के "O" जैसी हो गई थी। मैंने फिर उसका सिर पकड़ कर उसके होंठों का एक चुम्बन ले लिया। "थैंक यू मेरी मैना"
"ओह... थैंक यू मेरे मिट्ठू" उसने भी मुझे चूम लिया। वो बिस्तर पर उँकड़ू बैठी अपनी चूत और गाँड के छेदों को देख रही थी। उसने कहा, "देखो मेरी मुनिया और उसकी सौतन का क्या हाल कर दिया है तुमने"
"उसकी चूत सूज कर लाल हो गई थी और गाँड का रंग भी भूरे से लाल हो गया ता। उसकी चूत तो ऐसे लग रही थी जैसे किसी ने छोटी सी परवल को बीच में से चीर कर चौड़ा कर दिया हो। उसकी दरार तो ऐसे लग रही थी जैसे किसी नव-विवाहिता ने अपनी मोटी सी माँग भर रखी हो बिल्कुल लाल-सुर्ख। फिर मैंने कहा "अरे इसकी सुन्दरता तो और भी बढ़ गई है, वाह कितनी प्यारी लग रही है। केशर-क्यारी के बीच, गुलाब का खिला हुआ फूल हो जैसे। प्लीज़ एक चुम्मा लेने दो ना।" मैं उसकी ओर बढ़ा तो वो पीछे सरकती हुई बोली "हटो मतलबी कहीं के, औरतों की भावनाओं का तुम्हें क्या पता!"
"क्यों क्या हुआ मेरी मैना?"
"आपने अपनी मनमर्ज़ी आख़िर कर ही ली ना ? अब झूठा प्यार दिखा रहे हो।"
"वो कैसे ?"
"ऐसे तो बड़े मिट्ठू बने फिरते थे मधु दीदी के ?"
"ओह.. वो.. ." मेरी हँसी छूट गई। 'मेरी रात-कली ! तुम हम भँवरों की क़ैफियत (आदत) क्या जानो, कभी एक फूल पर चिपक कर नहीं बैठते।' पर मैंने कहा "वो तो मैं अब भी उसका मिट्ठू हूँ।"

"मैं भी यही देखना चाहती थी उस एकता कपूर को यही तो दिखाना था कि ये मिट्ठू मियाँ उन पर कितना लट्टू है। मेरे मन में भी उसे नीचा दिखाने की कहीं ना कहीं इच्छा थी। शुरु में तो मैं तुम्हें निरा लल्लू ही समझ बैठी थी पर तुम तो बड़े कलाकार निकले !" उसने कहा।

"ओह छोड़ो इन नीचे-ऊपर की बातों को। देखो मेरा पप्पू तुम्हारे लिए कैसे तड़प रहा है" मेरे शेर ने फिर से ठुमके लगाने शुरु कर दिए थे। मैं एक बार उसकी गाँड और मारना चाहता था। मैंने जब आगे बढ़ कर उसे बाँहों में लेना चाहा तो वह बोली, "ठहरो !"
"क्या हुआ?"
"नहीं इस बार मैं ऊपर आऊँगी..." और इससे पहले कि मैं कुछ समझता उसने मुझे एक धक्का दिया और उछल कर मेरे पेट के ऊपर बैठ गई। मुझे बाद में समझ आया कि वह बार-बार ऐसा क्यों कर रही है। दरअसल उसने ब्लू-फिल्म में आँटी को उस लड़के के ऊपर आकर चुदते हुए देखा था। साली उसी आसन में मुझसे भी चुदवाना चाहती थी। कोई बात नहीं, चाकू ख़रबूजे पर गिरे या ख़रबूजा चाकू पर पड़े, कटना तो ख़रबूजे को ही है ना। क्या फ़र्क पड़ता है। मेरा पप्पू भला ऐसा मौका क्यों छोड़ता। वो तो फिर तैयार हो चुका था और उसकी गाँड पर ठोकर लगा रहा था। उसे एक हाथ पीछे किया, थोड़ी सी ऊपर उठी और मेरे लंड को अपनी चूत के मुँह पर लगाकर गच्च से नीचे बैठ गई। मेरा लंड एक कही झटके में जड़ तक उसकी चूत में समा गया। उसके मुँह से ज़ोर की सिसकारी निकली "ओओईईईई... माँआआआआआ..." उसने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए। मैंने उन्हें चूम लिया। अब मैंने अपने एक हाथ से उसकी कमर को पकड़ा और दूसरे हाथ की उँगली से उसकी गाँड का छेद टटोला। एक ही चुदाई में वो ढीला हो गया था। मैंने गच्च से अपनी तर्जनी जड़ तक उसकी गाँड में ठोंक दी। निशा ज़ोर से चीखी..."

"ऊऊईईईईई माँआआआआ.. क्या करते हो... ओह जीजू, तुम भी एक नम्बर... ओह नो.. तुम पक्के दो नम्बर के बदमाश हो" और उसने मेरे होंठ इतने ज़ोर से काटे कि उनसे खून ही निकल आया। पर मुझे उसका कोई दर्द या ग़म नहीं था। बाहर पानी बरसना बन्द हो गया था पर हमारे अन्दर उबलता पानी तो बन्द होने का नाम ही नहीं ले रहा था।

दोस्तों अब मुठ मारना बन्द करो, अरे भई आज रात के लिए कुछ तो बचा कर रखो, क्या आप को आज गाँड नहीं मारनी ? और मेरी प्यार पाठिकाओं, आप भी अपनी गीली पैन्टी में उँगली करना छोड़ो और आज रात की तैयारी करो। धन्यवाद।

आपका प्रेम गुरु premguru2u@yahoo.com (premguru2u@yahoo.com) ; premguru2u@gmail.com (premguru2u@gmail.com)

sonali
27-06-2009, 01:02 AM
formating khrab hai is story ki

maheshyadav9889
29-07-2009, 11:58 AM
great story

Sumit kumar
30-07-2009, 06:44 PM
nice story.... ur stories are the best stories which i read

indi
30-07-2009, 10:51 PM
achchcha......

navcoolsky
22-08-2009, 01:53 AM
g8 work dude....

navcoolsky
22-08-2009, 01:54 AM
keep going......