premguru
26-06-2009, 08:17 PM
नन्दोइजी नहीं लन्दोइजी
“आपकी चूत पर उगी काली लम्बी घनी रेशमी झांटें देखी
इन्हें काटीयेगा नहीं चूत बे-परदा हो जायेगी ”
.... प्रेम गुरु की कलम से
मैंने लोगों से सुना था कि किसी लड़की या औरत की खूबसूरती उसके उरोजों (बूब्स) और नितम्बों से जानी जा सकती है. पर गुरूजी तो कुछ और ही फरमाते है. वो कहते है “चूत की सुन्दरता उसकी चौडाई से, गांड की सुन्दरता उसकी गहराई से और लंड की सुन्दरता उसकी लम्बाई से जानी जाती है. एक बार मैंने विशेष प्रवचन में गुरूजी से पूछा था कि चूत तो दो अंगुल की सुन्दर मानी जाती है तो फिर चूत की चौडाई से क्या अभीप्राय है तो गुरूजी ने डांटते हुए कहा था “अरे भोले इसके लिए दोनों अंगुलिओं को आडी नहीं सीधी [portreat] यानी कि लम्बवत देखा जाता है और ये अंगुलियों जैसी जीतनी लम्बी होगी उतनी ही सुन्दर होगी इसी लिए चूत दो अंगुल की सुन्दर मानी जाती है. मैं जिस चौडाई कि बात कर रहा हूँ वो चूत के नीचे दोनों जाँघों कि चौडाई की बात है.”
गुरूजी की बातें सब के समझ में इतनी जल्दी नहीं आती. खैर अगर ऐसी चूत और गांड की बात की जाए तो मधु से भी ज्यादा सुन्दर तो सुधा है. सुधा मेरी सलहज है. अरे भई मेरी पत्नी मधु के भैय्या की प्यारी पत्नी. वो पंजाब से है ना. उन्होंने रमेश से प्रेम विवाह किया है. उम्र 36 साल रंग गोरा 38-28-36. आप सोच रहे होंगे नितम्बों में 2” की कंजूसी क्यों पूरे 38’ क्यों नहीं ? इसका कारण साफ़ है वो बेचारी गांड मरवाने के लिए तरसती रही है. आप तो जानते हैं गांड मरवाने से नितम्बों का आकार और सुन्दरता बढ़ती है. रमेश का जब से एक्सीडेंट हुआ है और सेक्स की क्षमता (ताकत) कुछ कम हुई है वो बेचारी तो लंड के लिए तरस ही रही थी. वैसे भी रमेश को गांड मारना बिलकुल पसंद नहीं है. गुरूजी कहते है जिस आदमी ने अपनी खूबसूरत पत्नी की गांड नहीं मारी समझो वो जीया ही नहीं. उसका ये जन्म तो व्यर्थ ही गया. ऐसे ही आदमियों के लिए शायद ये गाली बनी हाई ‘साला चूतिया ’
सुधा मुझे नन्दोइजी कहकर बुलाती थी. लगता था जैसे उसके मुंह से लन्दोजी ही निकल रहा हो. पहले तो मैंने ध्यान नहीं दिया पर जब भी मैं अकेला होता तो पता नहीं वो जानबूझ कर ऐसा बोलती थी या उसकी बोली ही ऐसी थी मैंने गौर नहीं किया. एक बार जब मैं और मधु उनके यहाँ गए हुए थे मैंने बातों ही बातों में उसे मज़ाक में कह दिया
“भाभी आप मुझे नन्दोइजी मत बुलाया करो ”
“क्यों क्या आपको लन्दोइजी कहना अच्छा नहीं लगता ?” उसके चहरे पर कोई ऐसा भाव नहीं था जिस से मैं समझ सकता किकी उसके मन में क्या है. यही तो कुदरत ने इन औरतों को ख़ास अदा दी है.
“नहीं ऐसी बात नहीं है. दरअसल मैं आप से छोटा हूँ और आप मुझे जी लगाकर बुलाती है तो मुझे लगता है कि मैं कोई 60 साल का बूढा हूँ. ” मैंने हंसते हुए कहा कहा
“तो फिर कैसे … किस नाम से बुलाऊं लन्दोइजी ?”
“आप मुझे प्रेम ही बुला लिया करो ”
“ठीक है प्रेम प्यारे जी ” सुधा ने हंसते हुए कहा. जिस अंदाज में उसने कहा था उस फिकरे का मतलब तो मैं पिछले चार पांच महीनो से सोचता ही रहा था. अब भी कभी कभी मजाक में वो लंदोइजी कह ही देती है पर सबके सामने नहीं अकेले में.
बात कोई मेरी शादी के डेढ़ दो साल के बाद की है. इतने दिनों तक तो मैं मधु की चूत पर ही मोर (लट्टू) बना रहा पर जब उसकी चूत का छेद कुछ चौडा हो गया तो मेरा ध्यान उसकी नाजुक कोरी नरम मुकायम गांड पर गया. वो पट्ठी गांड के नाम से ही बिदक गई. उसने अपनी कॉलेज की किसी सहेली से सुना था कि गांड मरवाने में बहुत दर्द होता है और उसकी सहेली की तो पहली ही रात में उसके पति ने इतनी जोर से गांड मारी थी कि वो खून-ओ-खून हो गई थी और डॉक्टर बुलाने की नौबत आ गई थी. अब भला वो मुझसे इतनी जल्दी गांड कैसे मरवाती. मुझे उसे गांड मरवाने के लिए तैयार करने में पूरे 3 साल लग गए. खैर ये किस्सा अभी नहीं, बाद में अभी तो सिर्फ सुधा की बात ही करेंगे. (यह किस्सा “मेरी बीवी की दूसरी सुहागरात” में पढ़ सकते हैं)
कहते है जहां चाह वहाँ राह. लंड और पानी अपना रास्ता खुद बना लेते है. मधु को पहली डिलिवरी होने वाली थी. कभी भी हॉस्पिटल ले जाना पड़ सकता था. डॉक्टर्स ने चुदाई के लिए मना कर दिया था और वो गांड तो वैसे भी नहीं मारने देती थी. घर पर देखभाल के लिए सुधा (मेरी सलहज) आई हुई थी.
अक्टूबर का महीना चल रहा था. गुलाबी ठण्ड शुरू हो चुकी थी और मैं अपने लंड को हाथ में लिए मुठ मारने को मजबूर था. हमारे घर में गेस्ट रूम के साथ लगता एक कोमन बाथरूम है. एक दिन जब मैं उस बाथरूम में मुठ मार रहा था तो मैं जोर जोर से सीत्कार कर रहा था. ‘हाईई… शहद रानीई… तुम ही अपनी चूत दे दो क्या आचार डालोगी हाईई … चूत नहीं तो गांड ही दे दो …’ अचानक मुझे लगा कि कोई कि होल से देख रहा है. मैं झड़ तो गया पर मैंने सोचा कौन हो सकता है. मधु तो अपने कमरे में है फिर ….. नौकरानी है या कहीं मेरी शहद रानी (सुधा) तो नहीं थी. सुधा शहद की तरह मीठी है मैं उसे शहद रानी ही कह कर बुलाता हूँ.
जब मैं बाहर निकला तो सुधा तो मधु के पास बैठी गप्प लगा रही थी. नौकरानी अभी नहीं आई थी. मैं समझ गया ये जरूर सुधा ही थी. जैसे कि आप तो जानते ही हैं कि मैं एक नंबर का चुद्दकड़ हूँ पर मेरी पत्नी और ससुराल वालो के सामने मेरी छवि एकदम पत्नी भक्त और शरीफ आदमी की है. मधु तो मुझे निरा मिट्ठू ही समझती है. हे भगवान् सुधा ने क्या समझा होगा. उसके बाद तो दिन भर मैं उससे नजरें ही नहीं मिला सका.
संयोग से दो तीन दिनों बाद ही करवा-चोथ का व्रत था. मधु की हालत ऐसी नहीं थी कि वो व्रत रख सकती थी. मैंने उसकी जगह व्रत रख लिया. सुधा का भी व्रत था. इस व्रत में दिन भर भूखा रहना पड़ता है. चाँद को देखकर ही अपना व्रत तोड़ते हैं. आपकी जानकारी के लिए बता दूँ उत्तरी भारत में इस व्रत का बड़ा महत्व है. ख़ासकर राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में तो औरतें दिन में पानी तक नहीं पीती. मेरा दोस्त गोटी (गुरमीत सिंह) बताता है कि उसकी पत्नी तो बिना लंड चूसे और चूत चुसवाये अपना व्रत तोड़ती ही नहीं है. ऐसी मान्यता है कि करवा का व्रत रखने से और लंड का पानी पीने से पहला बच्चा लड़का ही पैदा होता है. पता नहीं कहाँ तक सच है पर जिस हिसाब से पंजाब और हरियाणा में लडके ज्यादा पैदा होते है इस बात में दम जरूर नजर आता है. अगले प्रवचन में गुरूजी से ये बात जरूर पूछूँगा.
एक खास बात तो बताना ही भूल गया. मधु भले ही उन दिनों गांड न मारने देती हो पर लंड चूसने में कोई कोताही नहीं कराती थी. और मेरा वीर्य तो जैसे उसके लिए अमृत है. वो कहती है कि पति का वीर्य पीने से उनकी उम्र बढती है और उसे शहद के साथ चाटने या पीने से आँखों की ज्योति बढाती है. वैसे तो ये गोली भी उसे मैंने ही पिलाई थी. पर इसी लिए तो मैं उसका मिट्ठू बना हुआ हूँ. करवाचोथ की रात चाँद देखने के बाद वो मेरा लंड चूसती है और पूरा पानी पीकर ही अपना व्रत तोड़ती है. मैं अपना व्रत उसका मधु रस (चूत रस) पीकर तोड़ता हूँ. पर मैं आज सोच रहा था कि आज तो मुझे सादा पानी पीकर और मधु को दवाई लेकर ही अपने व्रत तोड़ने पड़ेंगे.
ये कार्तिक माह का चाँद भी साला (बच्चो का मामा मेरा साला ही तो हुआ ना) रात को देर से ही उगता है बेचारी औरतों को सताने में पता नहीं इसको क्या मजा आता है. यार कम से कम हम जैसों के लिए तो पहले उग जाया करो. खैर कोई रात के 9.30 या 10 बजे के आपपास मैं छत पर चाँद देखने गया. पूर्व दिशा में चाँद ने अपनी लाली कब की बिखेरनी शुरू कर दी थी नीचे पेड़ पोधों और मकानों के कारण पता ही नहीं लगा. मैं जल्दी से सीढियों से नीचे आया. मधु तो ऊपर जा नहीं सकती थी सुधा ने एक थाली में कुछ फूल, रोली, करवा (मिटटी का बना छोटा सा लोटा), चावल, शहद, गुड़, मिठाई आदि रख कर मेरे साथ ऊपर आ गई. हमारे घर की छत पर एक छोटा सा स्टोर बना है उसके पीछे जाकर चाँद देखा जा सकता था. हम दोनों उसके पीछे चले गए. अगर कोई सीढियों से आ भी जाए तो कुछ दिखाई नहीं पड़ता. सुधा ने छलनी के अन्दर से चाँद को देखकर उसे करवे से पानी अर्पित किया और फिर खड़ी खड़ी अपनी जगह पर दो बार घूम गई. इस दौरान उसका पैर थोडा सा डगमगाया और उसके नितम्ब मेरे पाजामे में खड़े 7” के लंड से टकरा गए. मैंने अन्दर चड्डी नहीं पहनी थी. उसने एक बार मेरी ओर देखा पर बोली कुछ नहीं. उसने चाँद के आगे अपनी मन्नत मांगनी शुरू की :
“हे चाँद देवता मेरे पति की उम्र लम्बी हो उनका स्वास्थ्य ठीक रहे.... ” फिर थोडी धीमी आवाज में आगे बोली “और उनका वो सदा खडा और रस से भरा रहे ”
‘वो’ का नाम सुनकर मैं चोंका. मैंने जानता था ‘वो’ क्या होता है पर मैंने सुधा से पूछ ही लिया “भाभी ‘वो’ क्या हुआ ?”
“धत् …” वो इतना जोर से शरमाई जैसे 16 साल की नव विवाहिता हो.
“प्लीज बताओ ना भाभी ‘वो’ क्या ?”
“नहीं मुझे शर्म आती है ”
“प्लीज भाभी बताओ ना ”
“क्या मधु ने नहीं बताया ?”
“नहीं तो” मैं साफ़ झूठ बोल गया.
“इतने भोले तो आप और मधु नहीं लगते ?”
“सच भाभी वो.. तो वो तो … मेरा मतलब है …” मेरा तो गला ही सुखने लगा और मेरा लंड तो पहले से ही 120 डिग्री पर खडा था पत्थर की तरह कड़ा हो गया.
“मैं सब जानती हूँ मेरे लन्दोइजी … मुझे इतनी भोली भी मत समझो” और उसने मेरे खड़े लंड पर एक प्यारी सी चपत लगा दी. “हाय राम ये तो बड़ा दुष्ट है ” वो हंसते हुए बोली
अब बाकी क्या बचा रह गया था. मैंने उसे अपनी बाहों में भर लिया. वो भी मुझ से लिपट गई. मैंने अपने जलते हुए होंठ उसके होंठों पर रख दिए. उफ्फ्फ …. गुलाब की पंखुडियों जैसे नरम मुलायम होंठ. पता नहीं में कितनी देर उनका रस चूसता रहा. सुधा ने पजामे के ऊपर से ही मेरा लंड पकड़ रखा था और धीरे धीरे सहला रही थी. मैंने भी एक हाथ से उसकी साडी के ऊपर से ही उसकी चूत सहलानी शुरू कर दी शायद उसने भी पेंटी नहीं पहनी थी. उसकी झांटों को मैं अच्छी तरह महसूस कर रहा था. कोई 5 मिनट के बाद एक झटके के साथ वो अपने घुटनों के बल बैठ गई और मेरे पजामे का नाडा खोल कर मेरे पुप्पू को बाहर निकाल लिया. मेरा लंड तो पिछले 2 महीनो से प्यासा था. उसने बिना कोई देरी किये मेरा लंड एक ही झटके में अपने मुंह में ऐसे ले लिया जैसे कोई बिल्ली किसी मुर्गे की गर्दन पकड़ लेती है. मैं उसका सिर सहला रहा था. पता नहीं वो दिन भर की प्यासी थी या कई बरसों की. उसकी चूसने की लज्जत से मैं तो निहाल ही हो गया. क्या कमाल का लंड चूसती है. हालांकि मधु को मैंने लंड चूसने की पूरी ट्रेनिंग दी है पर सुधा जिस तरीके से मेरा लंड चूस रही थी मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि अगर लंड चुसाई का कोई मुकाबला करवा लिया जाए तो सुधा अब्बल नंबर आएगी.
वो कभी मेरे लंड को पूरा मुंह में ले लेती कभी बाहर निकाल कर चाटती कभी सुपाडे को ही मुंह में लेकर चूसती कभी उसपर अपने दांत से हौले से काट लेती. एक दो बार उसने मेरे दोनों चीकुओं (अण्डों) को भी मुंह में लेकर चूसा. मैं तो बस आह्ह … ओईई …. ओह्ह … या …. ही करता जा रहा था. कोई 7-8 मिनट हो गए थे. मैंने उसका सिर पकड़ रखा था और उसका मुंह ऐसे चोद रहा था जैसे वो कोई चूत ही हो. वो तो मस्त हुई जोर जोर से चूसे जा रही थी. अब मुझे लगाने लगा कि मैं झड़ने के करीब हूँ तो मैंने उसे इशारा किया मैं जाने वाला हूँ तो उसने भी इशारे से कहा “कोई बात नहीं ”
मैंने उसका सिर जोर से पकड़ लिया और अपने लंड को उसके मुंह में आगे पीछे करने लगा जैसे उसका मुंह न होकर चूत या गांड हो. और फिर एक दो तीन चार पांच ….. कितनी ही पिचकारियाँ मेरे लंड ने दनादन छोड़ दी. सुधा तो जैसे निहाल ही हो गयी उस अमृत को पी कर. उसका व्रत टूट गया था. उसने एक चटखारा लेकर कहा “वह मजा आ गया मेरे लन्दोइजी”
“आपका व्रत तो टूट गया पर मेरा कैसे टूटेगा ?”
“नहीं... अभी नहीं … बाद में… ”
पर मैं कहाँ मानने वाला था. मैंने एक झटके में उसकी साडी और पेटीकोट ऊपर कर दिया. वाह …. चाँद की दुधिया रोशनी में उसकी काले काले घुंघराले झांटों के झुरमुट से ढकी मखमली चूत देखने लायक थी. हालांकि उसकी चूत पर बहुत सारे झांट थे लम्बे लम्बे पर उसमे छुपी हुई मोटे मोटे होंठों वाली चूत साफ़ देखी जा सकती थी. जैसे किसी गुलदस्ते में सजा हुआ एक खिला गुलाब का फूल हो एकदम सुर्ख लाल. उसकी चूत पर उगे लम्बे लम्बे झांट देख कर मुझे पाकीज़ा फिल्म का वो डाईलोग याद आ गया :
“आपकी चूत पर उगी काली लम्बी घनी रेशमी झांटें देखी
इन्हें काटीयेगा नहीं चूत बे-परदा हो जायेगी ”
मैंने तड से एक चुम्बन उसपर ले लिया और उसके होंठ अपने मुंह में लेकर चूमने लगा. अन्दर वाले होंठ तितली के पंखों की तरह कोई दो ढाई इंच लम्बे तो जरूर होंगे. तोते की चोंच की तरह बने बीच के होंठ बहुत बड़ी चुद्दकड़ औरतों के होते है. मुझे लगा सुधा भी एक नंबर की चुद्दकड़ है. साले रमेश (मेरा साला) ने उसे ढंग से चोदा हो या नहीं पर चूत की फांकों को कमाल का चूसा होगा तभी तो इतनी बड़ी हो गई हैं.
“बस अब चलो बाकी बाद में नहीं तो मधु तुम्हारी जान निकाल देगी मेरे प्यारे नन्दोइजी अ…अरे नहीं लन्दोइजी …” उसने हंसते हुए कहा. मैं मन मार कर प्यासा ही बिना व्रत तोडे नीचे आ गया.
नीचे मधु मेरा इंतजार ही कर रही थी. सुधा रसोई में खाना लेने चली गई थी. जानबूझकर हमें अकेला छोड़ कर. मैं किसी प्यासे भंवरे की तरह मधु से लिपट गया. मुझे पता था वो मुझे चूत तो हरगिज नहीं चूसने देगी. और इस हालत में मेरा लंड वो कैसे चूसती. उसने एक चुम्बन पजामे के ऊपर से जरूर ले लिया. मुझे तो डर लगने लगा कि ऐसी हालत में तो मेरा लंड कुतुबमीनार बन जाता है आज खडा नहीं हुआ कहीं मधु को कोई शक तो नहीं हो जाएगा. पर वो कुछ नहीं बोली केवल मन ही मन चाँद देवता से मन्नत मांग रही थी “मेरे पति की उम्र लम्बी हो. उनका स्वास्थ्य ठीक रहे और उनका ‘वो ’ सदा खडा और रस से भरा रहे” मैं मुस्कुराए बिना नहीं रह सका मैंने उसके गालों पर एक चुम्बन ले लिया और उसने भी हौले से मुझे चूम लिया. फिर मैंने कर्वे के पानी में शहद मिलाया और एक घूँट पानी उसे पिलाया और बाकी का मैं पी गया. उसका व्रत टूट गया मेरा तो पहले ही टूट चूका था.
दुसरे दिन मधु को हॉस्पिटल भरती करवाना पड़ ही गया. हॉस्पिटल में पहले से ही सारी बात कर रखी थी. डॉक्टर ने बताया कि आज रात में डिलिवरी हो सकती है. जब मैंने रात में उसके पास रहने की बात कही तो डॉक्टर ने बताया कि रात में किसी के यहाँ रुकने और सोने की कोई जरुरत नहीं है आप चिंता नहीं करें. रात में इनके पास दो नर्सें सारी रात रहेंगी. कोई जरुरत हुई तो हम देख लेंगे. अन्दर से मैं भी तो यही चाहता था.
मैं और सुधा दोनों कार से घर वापस आ गए. जब हम घर पहुंचे तो रात के कोई 11.00 बज चुके थे. रास्ते में सिवा एक चुम्बन के उसने कुछ नहीं करने दिया. इन औरतों को पता नहीं मर्दों को सताने में क्या मजा आता है. बेड रूम के बाहर तो साली पुट्ठे पर हाथ ही नहीं धरने देती. खाना हमने एक होटल में ही खा लिया था वैसे भी इस खाने में हमें कोई ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी. हम तो असली खाना खाने के लिए बेकरार थे. आग दोनों तरफ लगी थी ना.
घर पहुंचाते ही सुधा बाथरूम में घुस गई और मैं बेडरूम में बैठा उसका इंतजार कर रहा था. मैंने अपना पजामा खोल कर नीचे सरका दिया था अपना 7” का लंड हाथ में पकडे बैठा उसे समझा रहा था. कोई आधे पोन घंटे के बाद एक झीनी सी नाइटी पहने सुधा बाथरूम से निकली. जैसे कोई मोडल रैंप पर कैट वाक करती है. कुल्हे मटकती हुए वो मेरे सामने कड़ी हो गई. उफ़ … क्या क़यामत का बदन था गूरा रंग गीले बाल थरथराते हुए होंठ. मोटे मोटे बूब्स पतली सी कमर और मोटे मोटे गोल नितम्ब. बिलकुल तनुश्री दत्ता जैसे. काली झीनी सी नाइटी में झांकती मखमली जाँघों के बीच फसी उसकी चूत देख कर मैं तो मंत्रमुग्ध सा उसे देखता ही रह गया. मेरे तो होश-ओ-हवास ही जैसे गुम हो गए.
“कहाँ खो गए मेरे लन्दोइजी”
मैंने एक ही झटके में उसे बाहों में भरकर बेड पर पटक दिया और तडा तड एक साथ कई चुम्बन उसके होंठों और गालों पर ले लिए. वो नीचे पड़ी मेरे होंठों को अपने मुंह में लेकर चूसने लगी. मैंने नाइटी के ऊपर से ही उसकी चूत के ऊपर हाथ फिराने लगा.
“ओह.. प्रेम थोडा ठहरो अपने कपडे तो उतार लो ” सुधा बोली
“आँ हाँ ” मैंने अपनी टांगो में फसे पजामे को दूर फेंक कर कुरता और बनियान भी उतार दी. और सुधा की नाइटी भी एक ही झटके में निकाल बाहर की. अब बेड पर हम दोनों मादरजात नंगे थे. उसका गोरा बदन ट्यूब लाइट की रोशनी में चमक रहा था. मैंने देखा उसकी चूत पर झांटों का नाम-ओ-निशाँ भी नहीं था. अब मैं समझा उसको बाथरूम में इतनी देर क्यों लगी थी. साली झांट काट कर पूरी तैयारी के साथ आई है. झांट काटने के बाद उसकी चूत तो एक दम गोरी चट्ट लग रही थी. हाँ उसकी दरार जरूर काली थी. ज्यादा चूत मरवाने या फिर ज्यादा चुसवाने से ऐसा होता है. और सुधा तो इन दोनों ही बातों में माहिर लगती थी.
ऐसी औरतों की चुदाई से पहले चूत या लंड चुसवाने की कोई जरुरत नहीं होती सीधी किल्ली ठोक देनी चाहिए. मेरा भी पिछले दो महीने से लंड किसी चूत या गांड के लिए तरस रहा था. और जैसा कि मुझे बाद में सुधा ने ही बताया था कि जयपुर से यहाँ आते समय रात को सिर्फ एक बार ही रमेश ने उसे चोदा था और वो भी बस कोई 4-5 मिनट. वो तो जैसे लंड के लिए तरस ही रही थी. ऐसी हालत में कौन चूमा चाटी में टाइम बर्बाद करना चाहेगा. मैंने अपना लंड उसकी चूत के मुहाने पर रख कर एक जोर का झटका मारा. गच्च की आवाज के साथ मेरा अध लंड उसकी नरम मक्खन सी चूत में घुस गया. दो तीन धक्कों में ही मेरा पूरा लंड जड़ तक उसकी चूत में समां गया. पूरा लंड अन्दर जाते ही उसने भी नीचे से धक्के लगाने शुरू कर दिए जैसे वो भी सदियों की प्यासी हो. चूत कोई ज्यादा टाइट नहीं लग रही थी पर जिस अंदाज में वो अपनी चूत को अन्दर से भींच कर संकोचन कर रही थी मेरा लंड तो निहाल होता जा रहा था , सुधा (शहद ) के नाम की तरह उसकी चूत भी बिलकुल शहद की कटोरी ही तो थी. सुधा ने अब मेरी कमर के दोनों ओर अपनी टाँगे कस कर लपेट ली. मैं जोर जोर से धक्के लगाने लगा.
कोई 10 मिनिट की धमाकेदार चुदाई के बाद मैंने महसूस किया कि उसकी चूत तो बहुत गीली हो गई है और लंड बहुत ही आराम से अन्दर बाहर हो रहा था. फच फच की आवाज आने लगी थी. उसे भी शायद इस बात का अंदाजा था. मैंने कहा भाभी क्या आपने कभी डॉग-कैट (कुत्ता-बिल्ली) आसन में चुदवाया है. तो उसने हैरानी से मेरी ओर देखा. मैंने कहा चलो इसका मजा लेते है. आप भी सोच रहे होंगे ये भला कौन सा आसन है. इस आसन में प्रेमिका को पलंग के एक छोर पर घुटनों के बल बैठाया जाता है एडियों के ऊपर नितम्ब रखकर. पंजे बेड के किनारे के थोड़े बाहर होते हैं. फिर एक तकिया उसकी गोद में रख कर उसका मुंह घुटनों की ओर नीचे किया जाता है. इस से उसका पेट दब जाता है जिस के कारण पीछे से चूत का मुंह तो खुल जाता है पर अन्दर से टाइट हो जाती है. प्रेमी पीछे फर्श पर खडा होकर कर अपना लंड चूत में दाल कर कमर पकड़ कर धक्का लगता है. यह आसन उन औरतों के लिए बहुत ही अच्छा होता है है जिनकी चूत फुद्दी बन चुकी हो. इस आसन की एक ही कमी है कि आदमी का पानी जल्दी निकल जाता है. मोटी गांड वाली औरतों के लिए ये आसन बहुत बढ़िया है. इस आसन में गांड मरवा कर तो वे मस्त ही हो जाती हैं. गांड मरवाते समय वो हिल नहीं सकती.
वो मेरे बताये अनुसार हो गई और मैंने अपने लंड पट थूक लगाया और पीछे आकर उसकी चूत में अपना लंड डालने लगा. अब तो चूत कमाल की टाइट हो गई थी. मैंने उसकी कमर पकड़ कर धक्के लगाने शुरू कर दिए. सुधा के लिए तो नया तजुर्बा था. वो तो मस्त होकर अपने नितम्ब जोर जोर से ऊपर नीचे करने लगी. उसके फूटबाल जैसे नितम्ब मेरे धक्को से जोर जोर से हिलाने लगे. उसकी गांड का छेड़ अब साफ़ दिख रहा था. कभी बंद होता कभी खुलता. मैंने अपनी अंगूठे पर थूक लगाया और गच्च से उसकी गांड में ठोक दिया. वो जोर से चिल्लाई “उईई माँ आ … ऑफ प्रेम क्या कर रहे हो. ओह … अभी नहीं अभी तो मुझे चूत में ही मजा आ रहा है. ” मैंने अपना अंगूठा बाहर निकाल लिया और उसके नितम्ब पर एक जोर की थपकी लगाई. उसके मुंह से अईई निकल गया और उसने भी अपने नितम्बों से पीछे धक्का लगाया. फिर मैंने उसकी कमर पकड़ कर धक्के लगाने शुरू कर दिए. 5 मिनट में ही वो झड़ गई.
अब मैंने उसे फिर चित लिटा दिया और उसके नितम्बों के नीचे 2 तकिये लगा दिए. उसने भी अपनी टाँगे उठा कर घुटनों को छाती से लगा लिया. अब उसकी चूत तो ऐसे लग रही थी जैसे उसकी दो अंगुलियाँ आपस में जुडी हों. अब मुझे गुरूजी की बात समझ लगी कि चूत दो अंगुल की क्यों कही जाती है. बीच की दरार तो एकदम बंद सी हो गई थी. चूत अब टाइट हो गई थी. मैंने अपना लंड फिर उसकी चूत में ठोक दिया और उसकी मोटी मोटी जांघें पकड़ कर धक्के लगाने चालु कर दिए.
5-7 मिनट की चुदाई के बाद उसने जब अपने पैर नीचे किये तो मेरा ध्यान उसके होंठों पर गया. उसके ऊपर वाले होंठ पर दायीं तरफ एक तिल बना हुआ था. ऐसी औरतें बहुत ही कामुक होती है और उन्हें गांड मरवाने का भी बड़ा शौक होता है. मैंने उसके होंठ अपने मुंह में ले लिए और चुसना शुरू कर दिया. वो ओह … आह्ह.. उईई कर रही थी. मैं एक हाथ से उसके गोल गोल संतारून को मसल रहा था और दूसरे हाथ की एक अंगुली से उसकी मस्त गांड का छेड़ टटोल रहा था. अचानक मेरी अंगुली से उसका छोटा सा नरम गीले छेड़ टकराया तो मैंने अपनी अंगुली की पोर उसकी गांड में डाल दी. उसने एक जोर की सीत्कार ली और मुझे अपनी बाहों में जकड लिया. शायद उसका पानी फिर निकल गया था. अब उसकी चूत से फ़च्छ फ़च्छ की आवाज आनी शुरू हो गई थी. “ओईई माँ … मैं तो गई ….” कह कर वो निढाल सी पड़ गई और आँखें बंद कर के सुस्त पड़ गई.
“आपकी चूत पर उगी काली लम्बी घनी रेशमी झांटें देखी
इन्हें काटीयेगा नहीं चूत बे-परदा हो जायेगी ”
.... प्रेम गुरु की कलम से
मैंने लोगों से सुना था कि किसी लड़की या औरत की खूबसूरती उसके उरोजों (बूब्स) और नितम्बों से जानी जा सकती है. पर गुरूजी तो कुछ और ही फरमाते है. वो कहते है “चूत की सुन्दरता उसकी चौडाई से, गांड की सुन्दरता उसकी गहराई से और लंड की सुन्दरता उसकी लम्बाई से जानी जाती है. एक बार मैंने विशेष प्रवचन में गुरूजी से पूछा था कि चूत तो दो अंगुल की सुन्दर मानी जाती है तो फिर चूत की चौडाई से क्या अभीप्राय है तो गुरूजी ने डांटते हुए कहा था “अरे भोले इसके लिए दोनों अंगुलिओं को आडी नहीं सीधी [portreat] यानी कि लम्बवत देखा जाता है और ये अंगुलियों जैसी जीतनी लम्बी होगी उतनी ही सुन्दर होगी इसी लिए चूत दो अंगुल की सुन्दर मानी जाती है. मैं जिस चौडाई कि बात कर रहा हूँ वो चूत के नीचे दोनों जाँघों कि चौडाई की बात है.”
गुरूजी की बातें सब के समझ में इतनी जल्दी नहीं आती. खैर अगर ऐसी चूत और गांड की बात की जाए तो मधु से भी ज्यादा सुन्दर तो सुधा है. सुधा मेरी सलहज है. अरे भई मेरी पत्नी मधु के भैय्या की प्यारी पत्नी. वो पंजाब से है ना. उन्होंने रमेश से प्रेम विवाह किया है. उम्र 36 साल रंग गोरा 38-28-36. आप सोच रहे होंगे नितम्बों में 2” की कंजूसी क्यों पूरे 38’ क्यों नहीं ? इसका कारण साफ़ है वो बेचारी गांड मरवाने के लिए तरसती रही है. आप तो जानते हैं गांड मरवाने से नितम्बों का आकार और सुन्दरता बढ़ती है. रमेश का जब से एक्सीडेंट हुआ है और सेक्स की क्षमता (ताकत) कुछ कम हुई है वो बेचारी तो लंड के लिए तरस ही रही थी. वैसे भी रमेश को गांड मारना बिलकुल पसंद नहीं है. गुरूजी कहते है जिस आदमी ने अपनी खूबसूरत पत्नी की गांड नहीं मारी समझो वो जीया ही नहीं. उसका ये जन्म तो व्यर्थ ही गया. ऐसे ही आदमियों के लिए शायद ये गाली बनी हाई ‘साला चूतिया ’
सुधा मुझे नन्दोइजी कहकर बुलाती थी. लगता था जैसे उसके मुंह से लन्दोजी ही निकल रहा हो. पहले तो मैंने ध्यान नहीं दिया पर जब भी मैं अकेला होता तो पता नहीं वो जानबूझ कर ऐसा बोलती थी या उसकी बोली ही ऐसी थी मैंने गौर नहीं किया. एक बार जब मैं और मधु उनके यहाँ गए हुए थे मैंने बातों ही बातों में उसे मज़ाक में कह दिया
“भाभी आप मुझे नन्दोइजी मत बुलाया करो ”
“क्यों क्या आपको लन्दोइजी कहना अच्छा नहीं लगता ?” उसके चहरे पर कोई ऐसा भाव नहीं था जिस से मैं समझ सकता किकी उसके मन में क्या है. यही तो कुदरत ने इन औरतों को ख़ास अदा दी है.
“नहीं ऐसी बात नहीं है. दरअसल मैं आप से छोटा हूँ और आप मुझे जी लगाकर बुलाती है तो मुझे लगता है कि मैं कोई 60 साल का बूढा हूँ. ” मैंने हंसते हुए कहा कहा
“तो फिर कैसे … किस नाम से बुलाऊं लन्दोइजी ?”
“आप मुझे प्रेम ही बुला लिया करो ”
“ठीक है प्रेम प्यारे जी ” सुधा ने हंसते हुए कहा. जिस अंदाज में उसने कहा था उस फिकरे का मतलब तो मैं पिछले चार पांच महीनो से सोचता ही रहा था. अब भी कभी कभी मजाक में वो लंदोइजी कह ही देती है पर सबके सामने नहीं अकेले में.
बात कोई मेरी शादी के डेढ़ दो साल के बाद की है. इतने दिनों तक तो मैं मधु की चूत पर ही मोर (लट्टू) बना रहा पर जब उसकी चूत का छेद कुछ चौडा हो गया तो मेरा ध्यान उसकी नाजुक कोरी नरम मुकायम गांड पर गया. वो पट्ठी गांड के नाम से ही बिदक गई. उसने अपनी कॉलेज की किसी सहेली से सुना था कि गांड मरवाने में बहुत दर्द होता है और उसकी सहेली की तो पहली ही रात में उसके पति ने इतनी जोर से गांड मारी थी कि वो खून-ओ-खून हो गई थी और डॉक्टर बुलाने की नौबत आ गई थी. अब भला वो मुझसे इतनी जल्दी गांड कैसे मरवाती. मुझे उसे गांड मरवाने के लिए तैयार करने में पूरे 3 साल लग गए. खैर ये किस्सा अभी नहीं, बाद में अभी तो सिर्फ सुधा की बात ही करेंगे. (यह किस्सा “मेरी बीवी की दूसरी सुहागरात” में पढ़ सकते हैं)
कहते है जहां चाह वहाँ राह. लंड और पानी अपना रास्ता खुद बना लेते है. मधु को पहली डिलिवरी होने वाली थी. कभी भी हॉस्पिटल ले जाना पड़ सकता था. डॉक्टर्स ने चुदाई के लिए मना कर दिया था और वो गांड तो वैसे भी नहीं मारने देती थी. घर पर देखभाल के लिए सुधा (मेरी सलहज) आई हुई थी.
अक्टूबर का महीना चल रहा था. गुलाबी ठण्ड शुरू हो चुकी थी और मैं अपने लंड को हाथ में लिए मुठ मारने को मजबूर था. हमारे घर में गेस्ट रूम के साथ लगता एक कोमन बाथरूम है. एक दिन जब मैं उस बाथरूम में मुठ मार रहा था तो मैं जोर जोर से सीत्कार कर रहा था. ‘हाईई… शहद रानीई… तुम ही अपनी चूत दे दो क्या आचार डालोगी हाईई … चूत नहीं तो गांड ही दे दो …’ अचानक मुझे लगा कि कोई कि होल से देख रहा है. मैं झड़ तो गया पर मैंने सोचा कौन हो सकता है. मधु तो अपने कमरे में है फिर ….. नौकरानी है या कहीं मेरी शहद रानी (सुधा) तो नहीं थी. सुधा शहद की तरह मीठी है मैं उसे शहद रानी ही कह कर बुलाता हूँ.
जब मैं बाहर निकला तो सुधा तो मधु के पास बैठी गप्प लगा रही थी. नौकरानी अभी नहीं आई थी. मैं समझ गया ये जरूर सुधा ही थी. जैसे कि आप तो जानते ही हैं कि मैं एक नंबर का चुद्दकड़ हूँ पर मेरी पत्नी और ससुराल वालो के सामने मेरी छवि एकदम पत्नी भक्त और शरीफ आदमी की है. मधु तो मुझे निरा मिट्ठू ही समझती है. हे भगवान् सुधा ने क्या समझा होगा. उसके बाद तो दिन भर मैं उससे नजरें ही नहीं मिला सका.
संयोग से दो तीन दिनों बाद ही करवा-चोथ का व्रत था. मधु की हालत ऐसी नहीं थी कि वो व्रत रख सकती थी. मैंने उसकी जगह व्रत रख लिया. सुधा का भी व्रत था. इस व्रत में दिन भर भूखा रहना पड़ता है. चाँद को देखकर ही अपना व्रत तोड़ते हैं. आपकी जानकारी के लिए बता दूँ उत्तरी भारत में इस व्रत का बड़ा महत्व है. ख़ासकर राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में तो औरतें दिन में पानी तक नहीं पीती. मेरा दोस्त गोटी (गुरमीत सिंह) बताता है कि उसकी पत्नी तो बिना लंड चूसे और चूत चुसवाये अपना व्रत तोड़ती ही नहीं है. ऐसी मान्यता है कि करवा का व्रत रखने से और लंड का पानी पीने से पहला बच्चा लड़का ही पैदा होता है. पता नहीं कहाँ तक सच है पर जिस हिसाब से पंजाब और हरियाणा में लडके ज्यादा पैदा होते है इस बात में दम जरूर नजर आता है. अगले प्रवचन में गुरूजी से ये बात जरूर पूछूँगा.
एक खास बात तो बताना ही भूल गया. मधु भले ही उन दिनों गांड न मारने देती हो पर लंड चूसने में कोई कोताही नहीं कराती थी. और मेरा वीर्य तो जैसे उसके लिए अमृत है. वो कहती है कि पति का वीर्य पीने से उनकी उम्र बढती है और उसे शहद के साथ चाटने या पीने से आँखों की ज्योति बढाती है. वैसे तो ये गोली भी उसे मैंने ही पिलाई थी. पर इसी लिए तो मैं उसका मिट्ठू बना हुआ हूँ. करवाचोथ की रात चाँद देखने के बाद वो मेरा लंड चूसती है और पूरा पानी पीकर ही अपना व्रत तोड़ती है. मैं अपना व्रत उसका मधु रस (चूत रस) पीकर तोड़ता हूँ. पर मैं आज सोच रहा था कि आज तो मुझे सादा पानी पीकर और मधु को दवाई लेकर ही अपने व्रत तोड़ने पड़ेंगे.
ये कार्तिक माह का चाँद भी साला (बच्चो का मामा मेरा साला ही तो हुआ ना) रात को देर से ही उगता है बेचारी औरतों को सताने में पता नहीं इसको क्या मजा आता है. यार कम से कम हम जैसों के लिए तो पहले उग जाया करो. खैर कोई रात के 9.30 या 10 बजे के आपपास मैं छत पर चाँद देखने गया. पूर्व दिशा में चाँद ने अपनी लाली कब की बिखेरनी शुरू कर दी थी नीचे पेड़ पोधों और मकानों के कारण पता ही नहीं लगा. मैं जल्दी से सीढियों से नीचे आया. मधु तो ऊपर जा नहीं सकती थी सुधा ने एक थाली में कुछ फूल, रोली, करवा (मिटटी का बना छोटा सा लोटा), चावल, शहद, गुड़, मिठाई आदि रख कर मेरे साथ ऊपर आ गई. हमारे घर की छत पर एक छोटा सा स्टोर बना है उसके पीछे जाकर चाँद देखा जा सकता था. हम दोनों उसके पीछे चले गए. अगर कोई सीढियों से आ भी जाए तो कुछ दिखाई नहीं पड़ता. सुधा ने छलनी के अन्दर से चाँद को देखकर उसे करवे से पानी अर्पित किया और फिर खड़ी खड़ी अपनी जगह पर दो बार घूम गई. इस दौरान उसका पैर थोडा सा डगमगाया और उसके नितम्ब मेरे पाजामे में खड़े 7” के लंड से टकरा गए. मैंने अन्दर चड्डी नहीं पहनी थी. उसने एक बार मेरी ओर देखा पर बोली कुछ नहीं. उसने चाँद के आगे अपनी मन्नत मांगनी शुरू की :
“हे चाँद देवता मेरे पति की उम्र लम्बी हो उनका स्वास्थ्य ठीक रहे.... ” फिर थोडी धीमी आवाज में आगे बोली “और उनका वो सदा खडा और रस से भरा रहे ”
‘वो’ का नाम सुनकर मैं चोंका. मैंने जानता था ‘वो’ क्या होता है पर मैंने सुधा से पूछ ही लिया “भाभी ‘वो’ क्या हुआ ?”
“धत् …” वो इतना जोर से शरमाई जैसे 16 साल की नव विवाहिता हो.
“प्लीज बताओ ना भाभी ‘वो’ क्या ?”
“नहीं मुझे शर्म आती है ”
“प्लीज भाभी बताओ ना ”
“क्या मधु ने नहीं बताया ?”
“नहीं तो” मैं साफ़ झूठ बोल गया.
“इतने भोले तो आप और मधु नहीं लगते ?”
“सच भाभी वो.. तो वो तो … मेरा मतलब है …” मेरा तो गला ही सुखने लगा और मेरा लंड तो पहले से ही 120 डिग्री पर खडा था पत्थर की तरह कड़ा हो गया.
“मैं सब जानती हूँ मेरे लन्दोइजी … मुझे इतनी भोली भी मत समझो” और उसने मेरे खड़े लंड पर एक प्यारी सी चपत लगा दी. “हाय राम ये तो बड़ा दुष्ट है ” वो हंसते हुए बोली
अब बाकी क्या बचा रह गया था. मैंने उसे अपनी बाहों में भर लिया. वो भी मुझ से लिपट गई. मैंने अपने जलते हुए होंठ उसके होंठों पर रख दिए. उफ्फ्फ …. गुलाब की पंखुडियों जैसे नरम मुलायम होंठ. पता नहीं में कितनी देर उनका रस चूसता रहा. सुधा ने पजामे के ऊपर से ही मेरा लंड पकड़ रखा था और धीरे धीरे सहला रही थी. मैंने भी एक हाथ से उसकी साडी के ऊपर से ही उसकी चूत सहलानी शुरू कर दी शायद उसने भी पेंटी नहीं पहनी थी. उसकी झांटों को मैं अच्छी तरह महसूस कर रहा था. कोई 5 मिनट के बाद एक झटके के साथ वो अपने घुटनों के बल बैठ गई और मेरे पजामे का नाडा खोल कर मेरे पुप्पू को बाहर निकाल लिया. मेरा लंड तो पिछले 2 महीनो से प्यासा था. उसने बिना कोई देरी किये मेरा लंड एक ही झटके में अपने मुंह में ऐसे ले लिया जैसे कोई बिल्ली किसी मुर्गे की गर्दन पकड़ लेती है. मैं उसका सिर सहला रहा था. पता नहीं वो दिन भर की प्यासी थी या कई बरसों की. उसकी चूसने की लज्जत से मैं तो निहाल ही हो गया. क्या कमाल का लंड चूसती है. हालांकि मधु को मैंने लंड चूसने की पूरी ट्रेनिंग दी है पर सुधा जिस तरीके से मेरा लंड चूस रही थी मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि अगर लंड चुसाई का कोई मुकाबला करवा लिया जाए तो सुधा अब्बल नंबर आएगी.
वो कभी मेरे लंड को पूरा मुंह में ले लेती कभी बाहर निकाल कर चाटती कभी सुपाडे को ही मुंह में लेकर चूसती कभी उसपर अपने दांत से हौले से काट लेती. एक दो बार उसने मेरे दोनों चीकुओं (अण्डों) को भी मुंह में लेकर चूसा. मैं तो बस आह्ह … ओईई …. ओह्ह … या …. ही करता जा रहा था. कोई 7-8 मिनट हो गए थे. मैंने उसका सिर पकड़ रखा था और उसका मुंह ऐसे चोद रहा था जैसे वो कोई चूत ही हो. वो तो मस्त हुई जोर जोर से चूसे जा रही थी. अब मुझे लगाने लगा कि मैं झड़ने के करीब हूँ तो मैंने उसे इशारा किया मैं जाने वाला हूँ तो उसने भी इशारे से कहा “कोई बात नहीं ”
मैंने उसका सिर जोर से पकड़ लिया और अपने लंड को उसके मुंह में आगे पीछे करने लगा जैसे उसका मुंह न होकर चूत या गांड हो. और फिर एक दो तीन चार पांच ….. कितनी ही पिचकारियाँ मेरे लंड ने दनादन छोड़ दी. सुधा तो जैसे निहाल ही हो गयी उस अमृत को पी कर. उसका व्रत टूट गया था. उसने एक चटखारा लेकर कहा “वह मजा आ गया मेरे लन्दोइजी”
“आपका व्रत तो टूट गया पर मेरा कैसे टूटेगा ?”
“नहीं... अभी नहीं … बाद में… ”
पर मैं कहाँ मानने वाला था. मैंने एक झटके में उसकी साडी और पेटीकोट ऊपर कर दिया. वाह …. चाँद की दुधिया रोशनी में उसकी काले काले घुंघराले झांटों के झुरमुट से ढकी मखमली चूत देखने लायक थी. हालांकि उसकी चूत पर बहुत सारे झांट थे लम्बे लम्बे पर उसमे छुपी हुई मोटे मोटे होंठों वाली चूत साफ़ देखी जा सकती थी. जैसे किसी गुलदस्ते में सजा हुआ एक खिला गुलाब का फूल हो एकदम सुर्ख लाल. उसकी चूत पर उगे लम्बे लम्बे झांट देख कर मुझे पाकीज़ा फिल्म का वो डाईलोग याद आ गया :
“आपकी चूत पर उगी काली लम्बी घनी रेशमी झांटें देखी
इन्हें काटीयेगा नहीं चूत बे-परदा हो जायेगी ”
मैंने तड से एक चुम्बन उसपर ले लिया और उसके होंठ अपने मुंह में लेकर चूमने लगा. अन्दर वाले होंठ तितली के पंखों की तरह कोई दो ढाई इंच लम्बे तो जरूर होंगे. तोते की चोंच की तरह बने बीच के होंठ बहुत बड़ी चुद्दकड़ औरतों के होते है. मुझे लगा सुधा भी एक नंबर की चुद्दकड़ है. साले रमेश (मेरा साला) ने उसे ढंग से चोदा हो या नहीं पर चूत की फांकों को कमाल का चूसा होगा तभी तो इतनी बड़ी हो गई हैं.
“बस अब चलो बाकी बाद में नहीं तो मधु तुम्हारी जान निकाल देगी मेरे प्यारे नन्दोइजी अ…अरे नहीं लन्दोइजी …” उसने हंसते हुए कहा. मैं मन मार कर प्यासा ही बिना व्रत तोडे नीचे आ गया.
नीचे मधु मेरा इंतजार ही कर रही थी. सुधा रसोई में खाना लेने चली गई थी. जानबूझकर हमें अकेला छोड़ कर. मैं किसी प्यासे भंवरे की तरह मधु से लिपट गया. मुझे पता था वो मुझे चूत तो हरगिज नहीं चूसने देगी. और इस हालत में मेरा लंड वो कैसे चूसती. उसने एक चुम्बन पजामे के ऊपर से जरूर ले लिया. मुझे तो डर लगने लगा कि ऐसी हालत में तो मेरा लंड कुतुबमीनार बन जाता है आज खडा नहीं हुआ कहीं मधु को कोई शक तो नहीं हो जाएगा. पर वो कुछ नहीं बोली केवल मन ही मन चाँद देवता से मन्नत मांग रही थी “मेरे पति की उम्र लम्बी हो. उनका स्वास्थ्य ठीक रहे और उनका ‘वो ’ सदा खडा और रस से भरा रहे” मैं मुस्कुराए बिना नहीं रह सका मैंने उसके गालों पर एक चुम्बन ले लिया और उसने भी हौले से मुझे चूम लिया. फिर मैंने कर्वे के पानी में शहद मिलाया और एक घूँट पानी उसे पिलाया और बाकी का मैं पी गया. उसका व्रत टूट गया मेरा तो पहले ही टूट चूका था.
दुसरे दिन मधु को हॉस्पिटल भरती करवाना पड़ ही गया. हॉस्पिटल में पहले से ही सारी बात कर रखी थी. डॉक्टर ने बताया कि आज रात में डिलिवरी हो सकती है. जब मैंने रात में उसके पास रहने की बात कही तो डॉक्टर ने बताया कि रात में किसी के यहाँ रुकने और सोने की कोई जरुरत नहीं है आप चिंता नहीं करें. रात में इनके पास दो नर्सें सारी रात रहेंगी. कोई जरुरत हुई तो हम देख लेंगे. अन्दर से मैं भी तो यही चाहता था.
मैं और सुधा दोनों कार से घर वापस आ गए. जब हम घर पहुंचे तो रात के कोई 11.00 बज चुके थे. रास्ते में सिवा एक चुम्बन के उसने कुछ नहीं करने दिया. इन औरतों को पता नहीं मर्दों को सताने में क्या मजा आता है. बेड रूम के बाहर तो साली पुट्ठे पर हाथ ही नहीं धरने देती. खाना हमने एक होटल में ही खा लिया था वैसे भी इस खाने में हमें कोई ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी. हम तो असली खाना खाने के लिए बेकरार थे. आग दोनों तरफ लगी थी ना.
घर पहुंचाते ही सुधा बाथरूम में घुस गई और मैं बेडरूम में बैठा उसका इंतजार कर रहा था. मैंने अपना पजामा खोल कर नीचे सरका दिया था अपना 7” का लंड हाथ में पकडे बैठा उसे समझा रहा था. कोई आधे पोन घंटे के बाद एक झीनी सी नाइटी पहने सुधा बाथरूम से निकली. जैसे कोई मोडल रैंप पर कैट वाक करती है. कुल्हे मटकती हुए वो मेरे सामने कड़ी हो गई. उफ़ … क्या क़यामत का बदन था गूरा रंग गीले बाल थरथराते हुए होंठ. मोटे मोटे बूब्स पतली सी कमर और मोटे मोटे गोल नितम्ब. बिलकुल तनुश्री दत्ता जैसे. काली झीनी सी नाइटी में झांकती मखमली जाँघों के बीच फसी उसकी चूत देख कर मैं तो मंत्रमुग्ध सा उसे देखता ही रह गया. मेरे तो होश-ओ-हवास ही जैसे गुम हो गए.
“कहाँ खो गए मेरे लन्दोइजी”
मैंने एक ही झटके में उसे बाहों में भरकर बेड पर पटक दिया और तडा तड एक साथ कई चुम्बन उसके होंठों और गालों पर ले लिए. वो नीचे पड़ी मेरे होंठों को अपने मुंह में लेकर चूसने लगी. मैंने नाइटी के ऊपर से ही उसकी चूत के ऊपर हाथ फिराने लगा.
“ओह.. प्रेम थोडा ठहरो अपने कपडे तो उतार लो ” सुधा बोली
“आँ हाँ ” मैंने अपनी टांगो में फसे पजामे को दूर फेंक कर कुरता और बनियान भी उतार दी. और सुधा की नाइटी भी एक ही झटके में निकाल बाहर की. अब बेड पर हम दोनों मादरजात नंगे थे. उसका गोरा बदन ट्यूब लाइट की रोशनी में चमक रहा था. मैंने देखा उसकी चूत पर झांटों का नाम-ओ-निशाँ भी नहीं था. अब मैं समझा उसको बाथरूम में इतनी देर क्यों लगी थी. साली झांट काट कर पूरी तैयारी के साथ आई है. झांट काटने के बाद उसकी चूत तो एक दम गोरी चट्ट लग रही थी. हाँ उसकी दरार जरूर काली थी. ज्यादा चूत मरवाने या फिर ज्यादा चुसवाने से ऐसा होता है. और सुधा तो इन दोनों ही बातों में माहिर लगती थी.
ऐसी औरतों की चुदाई से पहले चूत या लंड चुसवाने की कोई जरुरत नहीं होती सीधी किल्ली ठोक देनी चाहिए. मेरा भी पिछले दो महीने से लंड किसी चूत या गांड के लिए तरस रहा था. और जैसा कि मुझे बाद में सुधा ने ही बताया था कि जयपुर से यहाँ आते समय रात को सिर्फ एक बार ही रमेश ने उसे चोदा था और वो भी बस कोई 4-5 मिनट. वो तो जैसे लंड के लिए तरस ही रही थी. ऐसी हालत में कौन चूमा चाटी में टाइम बर्बाद करना चाहेगा. मैंने अपना लंड उसकी चूत के मुहाने पर रख कर एक जोर का झटका मारा. गच्च की आवाज के साथ मेरा अध लंड उसकी नरम मक्खन सी चूत में घुस गया. दो तीन धक्कों में ही मेरा पूरा लंड जड़ तक उसकी चूत में समां गया. पूरा लंड अन्दर जाते ही उसने भी नीचे से धक्के लगाने शुरू कर दिए जैसे वो भी सदियों की प्यासी हो. चूत कोई ज्यादा टाइट नहीं लग रही थी पर जिस अंदाज में वो अपनी चूत को अन्दर से भींच कर संकोचन कर रही थी मेरा लंड तो निहाल होता जा रहा था , सुधा (शहद ) के नाम की तरह उसकी चूत भी बिलकुल शहद की कटोरी ही तो थी. सुधा ने अब मेरी कमर के दोनों ओर अपनी टाँगे कस कर लपेट ली. मैं जोर जोर से धक्के लगाने लगा.
कोई 10 मिनिट की धमाकेदार चुदाई के बाद मैंने महसूस किया कि उसकी चूत तो बहुत गीली हो गई है और लंड बहुत ही आराम से अन्दर बाहर हो रहा था. फच फच की आवाज आने लगी थी. उसे भी शायद इस बात का अंदाजा था. मैंने कहा भाभी क्या आपने कभी डॉग-कैट (कुत्ता-बिल्ली) आसन में चुदवाया है. तो उसने हैरानी से मेरी ओर देखा. मैंने कहा चलो इसका मजा लेते है. आप भी सोच रहे होंगे ये भला कौन सा आसन है. इस आसन में प्रेमिका को पलंग के एक छोर पर घुटनों के बल बैठाया जाता है एडियों के ऊपर नितम्ब रखकर. पंजे बेड के किनारे के थोड़े बाहर होते हैं. फिर एक तकिया उसकी गोद में रख कर उसका मुंह घुटनों की ओर नीचे किया जाता है. इस से उसका पेट दब जाता है जिस के कारण पीछे से चूत का मुंह तो खुल जाता है पर अन्दर से टाइट हो जाती है. प्रेमी पीछे फर्श पर खडा होकर कर अपना लंड चूत में दाल कर कमर पकड़ कर धक्का लगता है. यह आसन उन औरतों के लिए बहुत ही अच्छा होता है है जिनकी चूत फुद्दी बन चुकी हो. इस आसन की एक ही कमी है कि आदमी का पानी जल्दी निकल जाता है. मोटी गांड वाली औरतों के लिए ये आसन बहुत बढ़िया है. इस आसन में गांड मरवा कर तो वे मस्त ही हो जाती हैं. गांड मरवाते समय वो हिल नहीं सकती.
वो मेरे बताये अनुसार हो गई और मैंने अपने लंड पट थूक लगाया और पीछे आकर उसकी चूत में अपना लंड डालने लगा. अब तो चूत कमाल की टाइट हो गई थी. मैंने उसकी कमर पकड़ कर धक्के लगाने शुरू कर दिए. सुधा के लिए तो नया तजुर्बा था. वो तो मस्त होकर अपने नितम्ब जोर जोर से ऊपर नीचे करने लगी. उसके फूटबाल जैसे नितम्ब मेरे धक्को से जोर जोर से हिलाने लगे. उसकी गांड का छेड़ अब साफ़ दिख रहा था. कभी बंद होता कभी खुलता. मैंने अपनी अंगूठे पर थूक लगाया और गच्च से उसकी गांड में ठोक दिया. वो जोर से चिल्लाई “उईई माँ आ … ऑफ प्रेम क्या कर रहे हो. ओह … अभी नहीं अभी तो मुझे चूत में ही मजा आ रहा है. ” मैंने अपना अंगूठा बाहर निकाल लिया और उसके नितम्ब पर एक जोर की थपकी लगाई. उसके मुंह से अईई निकल गया और उसने भी अपने नितम्बों से पीछे धक्का लगाया. फिर मैंने उसकी कमर पकड़ कर धक्के लगाने शुरू कर दिए. 5 मिनट में ही वो झड़ गई.
अब मैंने उसे फिर चित लिटा दिया और उसके नितम्बों के नीचे 2 तकिये लगा दिए. उसने भी अपनी टाँगे उठा कर घुटनों को छाती से लगा लिया. अब उसकी चूत तो ऐसे लग रही थी जैसे उसकी दो अंगुलियाँ आपस में जुडी हों. अब मुझे गुरूजी की बात समझ लगी कि चूत दो अंगुल की क्यों कही जाती है. बीच की दरार तो एकदम बंद सी हो गई थी. चूत अब टाइट हो गई थी. मैंने अपना लंड फिर उसकी चूत में ठोक दिया और उसकी मोटी मोटी जांघें पकड़ कर धक्के लगाने चालु कर दिए.
5-7 मिनट की चुदाई के बाद उसने जब अपने पैर नीचे किये तो मेरा ध्यान उसके होंठों पर गया. उसके ऊपर वाले होंठ पर दायीं तरफ एक तिल बना हुआ था. ऐसी औरतें बहुत ही कामुक होती है और उन्हें गांड मरवाने का भी बड़ा शौक होता है. मैंने उसके होंठ अपने मुंह में ले लिए और चुसना शुरू कर दिया. वो ओह … आह्ह.. उईई कर रही थी. मैं एक हाथ से उसके गोल गोल संतारून को मसल रहा था और दूसरे हाथ की एक अंगुली से उसकी मस्त गांड का छेड़ टटोल रहा था. अचानक मेरी अंगुली से उसका छोटा सा नरम गीले छेड़ टकराया तो मैंने अपनी अंगुली की पोर उसकी गांड में डाल दी. उसने एक जोर की सीत्कार ली और मुझे अपनी बाहों में जकड लिया. शायद उसका पानी फिर निकल गया था. अब उसकी चूत से फ़च्छ फ़च्छ की आवाज आनी शुरू हो गई थी. “ओईई माँ … मैं तो गई ….” कह कर वो निढाल सी पड़ गई और आँखें बंद कर के सुस्त पड़ गई.